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कपास (cotton) की कहानी

Cotton की कहानी

मैं कपास यानी cotton का पौधा हूँ. माल्वेसी कुल से हूँ. इतिहासकार कहते हैं कि मेरे धागों से बनी सबसे पुरानी चीजें मोहनजोदाड़ो नाम की प्राचीन सभ्यता में मिली हैं. यह बात इस ओर इशारा करती है कि मेरी उत्पत्ति यहीं कहीं भारत पाकिस्तान के सीमावर्ती इलाके में हुई होगी. वैसे तो दुनिया में कई जगहों पर मेरी अनेक किस्में विकसित हुई. इंसानोंसे मेरा सम्बन्ध  मेरी सबसे बड़ी खासियत मेरे बीजों से लगे हुए रेशों के कारण है. इन रेशों का प्रयोग मनुष्य ने अपना तन ढकने से ले कर हर संभव काम में किया. इसके पहले यही काम पशुओं के बाल (ऊन) और चमड़े से किया जाता था.

भारत के किसान दुनिया में सबसे ज्यादा कपास (cotton)उगाते हैं. भारत कपास का सबसे बड़ा उत्पादक देश है.

cotton farm
cotton का खेत

वैसे तो मैं एक बहुवर्षीय वृक्ष समुदाय से हूँ परन्तु मनुष्य ने मुझे साल दर साल उगाये जाने वाली किस्मों के रूप में विकसित कर लिया है. आपको पता है, मुझे ठण्ड पसंद नहीं. वृक्ष रूप में मैं कई साल तक फलता फूलता रहता हूँ और मेरी जड़ें काफी गहराई (कई मीटर, तने की लम्बाई से 6 गुना तक) जाती हैं. हालांकि मेरी कम अवधि वाली खेती की किस्मों की जड़ें इतनी गहरी नहीं जाती. जमीन का प्रकार, पोषक तत्व, जमीन में ऑक्सीजन की मात्रा, पानी और जमीन का तापमान मेरी जड़ों के विकास को प्रभावित करते हैं.

मुझे 6-8 पीएच (pH) मान वाली जमीनें पसंद हैं और मेरे रेशों का उत्पादन 7 pH वाली जमीन में सबसे बेहतर आता है. अगर जमीन लवणीय (नमक या सोडियम की अधिकता वाली जमीन) है तो भी मेरी खेती की जा सकती है. (pH के विषय में विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें)

जब जमीन में मेरा बीज बोया जाता है तो यह जरुरी है कि बीज की गहराई 3-4 सेंटीमीटर रखी जाए. नमी के संपर्क में आते ही जर्मिनेशन शुरू हो जाता है. 2-3 दिनों के भीतर पहली जड़ निकलती है और 4-10 दिन में अंकुर निकल आता है. 12-18 दिन आते आते पहली पत्ती (ट्रू लीफ) का प्रादुर्भाव होता है.

अगले 8-9 दिनों में दूसरी पत्ती निकलती है. पहला फूल आने में लगभग 60-80 दिनों का वक्त लग जाता है. परागण होने, दाने और रेशे बनने, बीज परिपक्व हो कर डेडू खुलने और तुड़ाई शुरू होने में 100-140 दिनों का वक्त लग जाता है. फूल से परिपक्व फल बनने में लगभग 50 दिनों का समय लगता है.

cotton plant
cotton plant

किसानों ने मेरे दो तरह के फूल तो देखे ही होंगे. सफ़ेद और गुलाबी. वास्तव में ये दो अलग तरह के फूल नहीं हैं बल्कि जब कली से फूल बनता है तो वह सफ़ेद रंग का ही होता है. २४ घंटे के बाद उसका रंग गुलाबी हो जाता है.

उच्च गुणवत्ता वाले अच्छे कपास तंतुओं की अधिकतम पैदावार पाने के लिए नाइट्रोजन और पोटाश कि मुख्य रूप से जरुरत होती है. जमीन में दिया गया नाइट्रोजन अमोनिया और नाइट्रोजन गैस बनकर उड़ता भी है, पानी के साथ बह भी जाता है. जमीन के बैक्टीरिया नाइट्रोजन को अपघटित भी करते हैं. इस तरह जमीन में नाइट्रोजन की कमी बनी रहती है.

नाइट्रोजन की कमी, कम जीवांश (आर्गेनिक मैटर/ organic matter) वाले खेतों में ज्यादा होती है. नाइट्रोजन की कमी न हो इसलिए फसल के दौरान बार बार नाइट्रोजन फ़र्टिलाइज़र देना फायदेमंद रहता है. इस समस्या का सामना करने के लिए मित्र सूक्ष्म जीवों की मदद भी ली जा सकती है. हवा की नाइट्रोजन को पौधों तक पहुंचाने के लिए एज़ोटोबैक्टर नाम के सूक्ष्म जीव का प्रयोग फायदे मंद रहेगा. एज़ोटोबैक्टर कई अन्य तरीकों से भी मेरी मदद करता है. इस मित्र के विषय में यहाँ क्लिक करके विस्तार से जान सकते हैं.

नाइट्रोजन की कमी से मेरे पौधे छोटे रह जाते हैं. शाखाएं कम बनती हैं, उनपर फल भी कम लगते हैं. फलों का झड़ना नाइट्रोजन कि कमी से बढ़ जाता है.  

अगर जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन दिया जाता है तो मेरी जड़ें छोटी रह जाती हैं और मुझपर रस चूसक और अन्य प्रकार के कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है.

cotton rows in a farm
cotton का खेत

इसी प्रकार पोटाश कि जरुरत भी मुझे शुरुआत से ही रहती है पर फलों के पकने के समय मुझे इसकी ख़ास जरुरत होती है. तंतु लंबा बने इसलिए पोटाश जरुरी होता है. पोटाश की पर्याप्तता में बीमारियाँ भी कम लगती हैं. अगर पोटाश कि कमी बनी रहती है तो मेरे डेडू यानी फल खुल नहीं पाते.

फॉस्फोरस का मेरे रेशों कि गुणवत्ता पर सीधा प्रभाव तो नहीं पड़ता पर फॉस्फोरस जरुरी तत्व है. क्षारीय मिट्टी में फॉस्फोरस की उपलब्धता कम होती है. इस समस्या के समाधान के लिए भूमि में जीवांश की मात्रा बढ़ा कर और फॉस्फोरस घोलने वाले सूक्ष्म जीवों का प्रयोग करके किया जा सकता है. फोस्फोरस फ़र्टिलाइज़र का इस्तेमाल बुवाई के पहले य फिर शुरूआती अवस्था में ही कर लेना चाहिए. फॉस्फोरस की अत्यधिक कमी होने पर बढ़वार रुक जाती है, फूलों कि संख्या कम हो जाती और फल देर से पकते हैं.

अन्य पौधों की तरह मुझे भी सल्फर, बोरोन, कैल्शियम, जिंक, आयरन, मैग्नीशियम, कॉपर, मैंगनीज, मोलिब्डेनम आदि तत्वों की जरुरत पड़ती है. आप तो जानते ही हैं फॉस्फोरस, मैग्नीशियम और कैल्शियम की खास दुश्मनी है. उसपर आगे कभी बात करेंगे.

एक ख़ास बात, मैं कीटों से अपनी सुरक्षा करने के लिए गोसिपोल नाम का जहरीला तत्व बना सकता हूँ. यह मेरी पत्ती, तने, कलियों और फल कि सतह पर बनता है. मेरे बीजों से निकले तेल में यह 1.5% तक होता है.

आगे की कड़ियों में मित्र और शत्रु कीटों से मेरे सम्बन्धों के विषय में चर्चा करेंगे.

लेखक परिचय :

pushpendra awadhiya

डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया

Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी

विषय रूचि- सूक्ष्मजीव विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जैव रसायन और प्रकृति अनुकूल टिकाऊ कृषि विधियां

कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर  चलें.

किसान भाई कृषि सम्बन्धी समस्याओं के समाधान हेतु Whatsapp-7987051207 पर विवरण साझा कर सकते हैं.

Agriculture के लिए जरुरी; भूमि के पीएच (pH) मान की जानकारी
https://bacter.in/potassium/
Agriculture में मैग्नीशियम (Magnesium) का रोल
बहुउद्देधीय जैविक खाद
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Agriculture में मैग्नीशियम (Magnesium) का रोल

Agriculture में मैग्नीशियम (Magnesium) मुख्य पोषक तत्वों में से है. यह औसतन पौधे के वजन का 0.2 से 0.4 प्रतिशत भाग बनाता है.

मैग्नीशियम (Magnesium) का प्रमुख कार्य

मैग्नीशियम (Magnesium) का प्रमुख कार्य प्रकाश संश्लेषण के केंद्र क्लोरोफिल की क्रियाशालता के मुख्य हिस्से के तौर पर है. मैग्नीशियम क्लोरोफिल मॉलिक्यूल के केंद्र में स्थित होता है और प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

chlorophyll
क्लोरोफिल की संरचना. इसके केंद्र में मैग्नीशियम होता है जिसे बांधने का काम नाइट्रोजन करता है.
(N=नाइट्रोजन, O=ऑक्सीजन, C= कार्बन, Mg=मैग्नीशियम, H=हाइड्रोजन )

मैग्नीशियम (Magnesium) पौधों में कई एंजाइम की क्रियाशीलता के लिए आवश्यक तत्व है. कार्बन स्थिरीकरण यानी प्रकाश शंश्लेषण द्वारा शर्करा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले एंजाइम, रूबीस्को (RuBisCO) और फोस्फोइनोलपायरुबेट कार्बोक्सीलेज (PEPC) की क्रियाशीलता, मैग्नीशियम पर निर्भर करती है.

मैग्नीशियम की कमी से पौधे कि प्रकाश संश्लेषण क्रिया और उसके आगे की कार्बन स्थिरीकरण की क्रिया बाधित होती है.

मैग्नीशियम (Magnesium) का एक प्रमुख कार्य राइबोसोम नामक कोशिकांग की स्थिरता बनाये रखना भी है. राइबोसोम वे कोशिकांग है जो प्रोटीन और एंजाइम संश्लेषण के लिए उत्तरदाई हैं. अर्थात मैग्नीशियम की कमी से प्रोटीन और एंजाइम का निर्माण भी प्रभावित होगा और पौधे जल्दी से बुढ़ापे को प्राप्त हो जाएंगे. इसी कारण मैग्नीशियम की अत्यधिक कमी होने पर पत्तियां झड़ना, पौधों पर विभिन्न स्थानों पर घाव होना आदि लक्षण भी दिखाई देते हैं. अत्यधिक कमी होने पर पौधे, छोटे-छोटे और कड़े फलों का निर्माण करते हैं.

मैग्नीशियम (Magnesium) की कमी के लक्षण और कारक

मैग्नीशियम (Magnesium) की कमी से पौधों की पत्तियां पीली पड़ती हैं और क्लोरोफिल नष्ट होता है. इसकी कमी के लक्षण पुरानी पत्तियों पर पहले दिखते हैं. अगर भूमि में Magnesium की कमी है, और नई पत्तियों में क्लोरोफिल के निर्माण के लिए मैग्नीशियम उपलब्ध नहीं है तो पौधा निचली पत्तियों में क्लोरोफिल को नष्ट कर, इससे प्राप्त मैग्नीशियम को नई बन रही पत्तियों की ओर भेजता है.

MAGNESIUM SRYSTALS MOD
मैग्नीशियम सल्फेट के क्रिस्टल

रासायनिक रूप से मैग्नीशियम सल्फर और क्लोरीन के साथ घुलनशील योगिक (Magnesium chloride और Magnesium sulfate) बनाता है, और जमीन से आसानी से लीच हो जाता है. पानी के साथ और फसल अपशिष्ट के रूप में खेत से लगातार लीचिंग और निकासी के कारण जमीन में इसकी कमी होती जाती है और फसलों में इसकी कमी के लक्षण आसानी से देखे जा सकते हैं.

Magnesium की कमी के लक्षण हल्की रेतीली मिट्टी में (जिनका पीएच एसिडिक हो) ज्यादा दिखाई देते हैं. वहीं, जीवांश यानी कम्पोस्ट मैग्नीशियम की लीचिंग को रोकने का कार्य करता है.

प्रकाश संश्लेषण के लिए जिम्मेदार क्लोरोफिल की क्रियाशीलता मैग्नीशियम पर निर्भर है. (क्लोरोफिल का केन्द्रीय अणु मैग्नीशियम है)

अगर पोटैशियम और मैग्नीशियम का असंतुलन है यानी अधिक मात्रा में पोटेशियम दिया गया है और मैग्नीशियम कम मात्रा में दिया गया है तो भी मैग्नीशियम की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं.

Agriculture में मैग्नीशियम (Magnesium)की कमी के लक्षण कई बार पौधों में वायरस के इन्फेक्शन जैसे भी दिखाई देते हैं.

मैग्नीशियम के स्त्रोत

Agriculture के लिए मैग्नीशियम की पूर्ति हेतु बेसल डोज के तौर पर डोलोमाइट चूना पत्थर (मैग्नीशियम कार्बोनेट कैल्शियम कार्बोनेट) का पिसा हुआ पाउडर प्रयोग किया जा सकता है. परन्तु यह मिट्टी का पीएच बढ़ाता है, इसलिए अधिक pH वाले खेतों के लिए उपयुक्त नहीं है. यानी जब पीएच करेक्शन की जरूरत ना हो तो मैग्नीशियम सल्फेट घुलित रूप में दिया जाने वाला सबसे आसानी से उपलब्ध रसायन है. मैग्नीशियम सल्फेट देने पर पौधे को घुलित रूप में सल्फर भी प्राप्त होता है.

कपास के खेतों में मैग्नीशियम (Magnesium) की खास कमी दिखाई देती है मैग्नीशियम की कमी से इसकी पत्तियां पहले पीले और फिर लाल रंग की होने लग जाती है. लाल धारियों के रूप में ठीक यही लक्षण मक्के और गन्ने की फसल में भी देखे जा सकते हैं. सोयाबीन की पुरानी पत्तियां पीली पड़ने लग जाती हैं यह भी मैग्नीशियम की कमी से होता है.

अगर फसल में Magnesium कम है तो इसका प्रभाव पशुओं पर भी पड़ता है.

मैग्नीशियम की कमी से फसलों के भूसे में भी मैग्नीशियम की मात्रा कम जाती है और पशुओं को खिलाए जाने पर उनकी दूध उत्पादन की क्षमता कम हो जाती है. पशुओं में मैग्नीशियम की अत्यधिक कमी होने पर उनकी हड्डियां भी कमजोर होती जाती है.

Magnesium के खनिज

प्राकृतिक खनिज के रूप में मैग्नीशियम कैसीटेराइट रूप में मिलता है इसमें मैग्नीशियम सल्फेट हाइड्रेटेड रूप में होता है. कैसीटेराइट मुख्य रूप से जर्मनी द्वारा उत्पादित किया जाता है. मैग्नीशियम ऑक्साइड भी मैग्नीशियम का स्रोत है, इसमें 56 प्रतिशत तक मैग्नीशियम होता है, परंतु यह घुलनशील नहीं होता है.

खनिजों का प्रयोग करके सिंथेटिक रूप से तैयार किया गया मैग्नीशियम सल्फेट सबसे आसानी से उपलब्ध मैग्नीशियम का स्रोत है.

मैग्नीशियम सल्फेट जिसमें पानी के सात अणु जुड़े हुए होते हैं, 9% मैग्नीशियम धारित करता है और इसे एप्सम साल्ट के नाम से भी जाना जाता है.

डोलोमाइट; मैग्नीशियम कार्बोनेट कैल्शियम कार्बोनेट का मिश्रित रूप है जिसमें स्रोत के अनुसार 4 से 6% तक मैग्नीशियम हो सकता है परंतु यह पानी में घुलनशील नहीं होता है. क्षारीय मृदा में घुलनशीलता और भी कम हो जाती है. इसका प्रयोग करने के लिए कंपोस्ट अच्छी मात्रा में खेत में डालना चाहिए.

शोनाइट (Schoenite) पोटेशियम सल्फेट मैग्नीशियम सल्फेट का संयुक्त रुप है, इसमें भी लगभग 6% मैग्नीशियम होता है. मैग्नीशियम नाइट्रेट में 9% मैग्नीशियम पाया जाता है और यह पानी में पूर्णतः घुलनशील है. Agriculture में पोटैशियम शोनाइट का प्रयोग बढ़ रहा है.

आइये कपास के उदाहरण से मैग्नीशियम (Magnesium) की कमी को पहचानें-

कपास (cotton) में मैग्नीशियम की कमी के लक्षण. लाल सिरे और पत्तियों का जलना (नेक्रोसिस). (नोट- पौधों में पोटाश, नाइट्रोजन, फोस्फोरस सहित अन्य पोषकों की मिली जुली कमी भी हो सकती है)

संतुलित पोषण, कम्पोस्ट और मोबिलाइजर सूक्ष्मजीवों के साथ उग रही कपास (cotton)

संतुलित पोषण, कम्पोस्ट और मोबिलाइजर सूक्ष्मजीवों के साथ उग रही कपास. सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों की उपलब्धता और जैविक गतिशीलता बनाये रखने में मदद करते हैं.

(मूल लेख 19/07/2018 को प्रकाशित हुआ था)

लेखक परिचय :

pushpendra

डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया

Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी

Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजीPh.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी

कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.

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