सोयाबीन Soybean का पीलापन

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हरीभरी फ़सल हर किसान की आशा होती है, खासतौर पर सोयाबीन Soybean जैसी दलहनी फ़सल तो प्राकृतिक रूप से ज्यादा गहरे हरे रंग की होनी चाहिए.

सोयाबीन की खेती में किसान सामान्यतः पोषण आवश्यकताओं का ध्यान नहीं रखते बल्कि कीटनाशियों और चारा नाशक दवाओं को ज्यादा तवज्जो देते हैं, परिणाम स्वरुप सोयाबीन की पैदावार में लगातार गिरावट आती जा रही है साथ ही पोषण की कमी से कमजोर हुई फसल में तरह तरह का कीट प्रकोप और फफूंद का संक्रमण भी बढ़ता जा रहा है.

इस आर्टिकल में हम सोयाबीन soybean के पीलेपन के विषय पर बात करेंगे.

तो सबसे पहले हमें यह जानना है कि फसल का हरा रंग कहाँ से आता है?

संछेप में पौधे में सुचारू प्रकाश शंश्लेषण के लिए आवश्यक क्लोरोफिल के कारण पौधा हरा दिखता है. क्लोरोफिल कि संरचना में नाइट्रोजन का प्रमुख रोल है क्योंकि यही नाइट्रोजन, मैग्नीशियम को बांधने का कार्य करती है. नाइट्रोजन की कमी से क्लोरोफिल का निर्माण बाधित होता है और पौधा पीला दिखने लगता है. पौधों में मैग्नीशियम की कमी होने पर भी क्लोरोफिल का निर्माण बाधित होता है जिससे पौधों की पत्तियां पीली पड़ती हैं, अत्यधिक कमी होने पर पत्तियों में भूरे धब्बे उभरते हैं जहाँ बाद में घाव हो जाते हैं.

सोयाबीन के पौधों में जिंक की कमी होने पर भी पत्तियां पीली पड़ती है और बढ़वार रुक जाती है. यानी कम हाइट कि पीली फसल में जिंक की कमी हो सकती है.

सोयाबीन की पत्तियों का किनारों पर पीला पड़ना और हल्के हरे रंग का होना सल्फ़र की कमी दर्शाता है. सल्फ़र तत्व पौधों के भीतर ज्यादा चलायमान/गतिशील नहीं होता, परन्तु आर्गेनिक मैटर यानी जीवांश के विघटन से उत्पन्न सल्फर डाई ऑक्साइड और अन्य उड़नशील गैसीय सल्फ़र यौगिकों के माध्यम से पौधे सल्फ़र ग्रहण कर सकते हैं. पानी में डिस्पर्सिबल सल्फर (WDG सल्फर पाउडर) का छिडकाव फसल में सल्फ़र की कमी पूरी करने का सस्ता और आसन उपाय है.

सल्फ़र के छिडकाव से कुछ प्रकार की फंगस और रस चूसक कीट जैसे थ्रिप्स और लाल बारीक मकड़ी की भी रोकथाम होती है.

सोयाबीन में पोटाश की कमी के लक्षण, सल्फर की कमी से मिलते जुलते दिखते हैं. हालांकि पोटाश अत्यधिक मोबाइल एलिमेंट है परन्तु यदि भूमि में पौधों के लिए उपलब्ध रूप में उपस्थित नहीं पौधों है तो पौधों में इसकी कमी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं.

अब आइये चलते हैं पौधों के जीवन में सबसे जरुरी तत्व नाइट्रोजन की ओर. नाइट्रोजन ही वह तत्व है जो हवा में 78% होने के बाद भी जीवों के लिए उपलब्ध नहीं है! पौधे, जंतु, फंगस और अधिकांश सूक्ष्म जीव इसे हवा से नहीं ले पाते और नाइट्रोजन के समुद्र में नाइट्रोजन की कमी से मारे जाते हैं. मनुष्यों के लिए जरुरी प्रोटीन भी इसी नाइट्रोजन से बनता है.

कुछेक सूक्ष्म जीवों में ही वह मशीनरी होती है जिसके द्वारा वे हवा की नाइट्रोजन को पकड़कर जैविक रूप यानी अक्रियाशील डाईनाइट्रोजन N2 से क्रियाशील नाइट्रोजन यानी अमोनिकल रूप NH3 में बदल सकते हैं. इसी अमोनिकल नाइट्रोजन से बाद में प्रोटीन सहित अनेक नाइट्रोजन युक्त यौगिकों का निर्माण होता है, जैसे क्लोरोफिल में उपस्थित मैग्नीशियम को बांधने का कार्य नाइट्रोजन ही करता है. एक बात ध्यान देने की है कि अमोनिकल रूप अत्यधिक क्रियाशील होने के कारण अगर आवश्यकता से अधिक रूप में डाला जाता है तो यह फसल को नुकसान भी पहुंचा सकता है, खासकर अधिक तापमान वाले मौसम में. यूरिया भी अमोनिकल नाइट्रोजन का ही रूप है (यूरिया का रासायनिक फ़ार्मूला NH2-CO-NH2 है).

प्राकृतिक रूप से राइजोबियम और एज़ोटोबैक्टर हवा की नाइट्रोजन को पौधों के लिए उपयोगी अमोनिकल नाइट्रोजन में बदल देते हैं. इस काम के लिए इनके पास नाइट्रोजिनेज नाम का एंजाइम होता है. मोलिब्डेनम (Molybdenum), आयरन (Iron) और सल्फर (Sulfur) नाइट्रोजिनेज एंजाइम की क्रियाशीलता के लिए जरुरी तत्व हैं.

सोयाबीन सहित सभी दलहनी फसलें, जिनमें कई खरपतवार भी शामिल हैं, प्राकृतिक रूप से राइजोबियम बैक्टीरिया को अपनी जड़ों में स्थान देने के लिए सक्षम होती हैं. अलग अलग दलहनी फसलों का अलग अलग प्रजाति के राइजोबियम के साथ विशिष्ट सम्बन्ध होता है, यानी एक ही राइजोबियम हरेक दलहनी फसल के साथ प्रयोग नहीं किया जा सकता.

राइजोबियम सूक्ष्म जीव नाइट्रोजन स्थिरीकरण के अलावा कई प्रकार से सोयाबीन की बढवार और पैदावार को सकारात्मक रूप से  प्रभावित करते हैं.

यह देखा गया है कि जिन खेतों में लगातार चरामार दवाई और कॉपर आधारित फफूंद नाशियों का अत्यधिक इस्तेमाल होता है या पोषण प्रबंधन समुचित रूप से नहीं किया जाता उन खेतों में राइजोबियम की संख्या कम होती जाती है. बीजों का रासायनिक उपचार भी राइजोबियम के लिए कई बार नुकसानदेह पाया  गया है.

Soybean Rhizobium nodules- bacter
राइजोबियम की गठानें अपनी शुरुआती अवस्था में

नीचे के चित्रों में आप देख सकते हैं की सोयाबीन (soybean) की फसल में राइजोबियम की गठानें नहीं होने से फ़सल का पीलापन किस प्रकार सम्बंधित है.

राइजोबियम सूक्ष्म पोषण दोनों की कमी
soybean roots devoid of rhizobium nodules- bacter
राइजोबियम विहीन सोयाबीन की जड़ें
soybean roots devoid of rhizobium nodules- bacter
राइजोबियम विहीन सोयाबीन की पत्तियां
पर्याप्त राइजोबियम और कम सूक्ष्म पोषण
enough rhizobium soybean- bacter
पर्याप्त राइजोबियम वाली सोयाबीन की जड़ें, बिना सूक्ष्म पोषक तत्वों के
enough rhizobium but deficient in micronutrients- bacter
पर्याप्त राइजोबियम वाली सोयाबीन की पत्तियां, बिना सूक्ष्म पोषक तत्वों के प्रयोग के
राइजोबियम और अन्य मित्र सूक्ष्म जीवों से उपचारित और पर्याप्त संतुलित पोषण वाली सोयाबीन की फ़सल

निष्कर्ष:

सोयाबीन को राइजोबियम से उपचारित करके बोयें. पोटाश, मैग्नीशियम, सल्फर और जिंक का प्रयोग करें. जिंक और मैग्नीशियम के साथ अन्य पोषक तत्व स्प्रे में भी लिए जा सकते हैं.

ज्यादा बेहतर होगा अगर संतुलित पोषण का ध्यान रखा जाये.

सोयाबीन के प्रमुख कीट (Pests of Soybean)
लेखक परिचय:
Pushpendra Awadhiya | Bacter | प्रकृति अनुकूल खेती|

डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया (Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी)

विषय रूचिसूक्ष्मजीव विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जैव रसायन और प्रकृति अनुकूल टिकाऊ कृषि विधियां

कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये सब की भलाई के लिए विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.
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