तरबूज एक प्रमुख कैश क्रॉप है. इसकी आइसबॉक्स किस्में उपयुक्त मौसम में ७०-८० दिन में पक कर तैयार हो जाती है. हलाकि अच्छा उत्पादन लेने के लिए मल्चिंग और ड्रिप की व्यवस्था होना जरुरी है. जबकि बड़े फल वाली और (धारीदार) बिना प्लास्टिक मल्च के भी अच्छा उत्पादन देती है, क्योकि इसका नेचर vigerous होता है.

वर्तमान में छोटे किसान, अपेक्षाकृत कम पानी में भी तरबूज की आइसबॉक्स किस्में उगा लेते हैं, वो भी बढ़िया पैदावार के साथ. जबकि पहले तरबूज सिर्फ नदी तालाब के किनारे की फसल मानी जाती थी.

 

तरबूज के खेती के लिए हल्की जमीन (जिसमे पानी का जमाव न हो ) का चुनाव बेहतर रहता है, हलाकि भरी जमीन में भी तरबूज अच्छी उपज देता है परन्तु वेजिटेटिव ग्रोथ ज्यादा होती है.

मिट्टी में जीवांश यानि आर्गेनिक खाद (कंपोस्ट), तरबूज की अच्छी पैदावार के लिए जरूरी है.

बेसल डोज में सुपर फॉस्फेट या डीएपी या NPK 12:32:16 अदि कम घुलनशील खाद का प्रयोग किया जाता है. बेसल में पोटाश की थोड़ी मात्रा जरुरी है. जिन खेतों की मिट्टी परीक्षण में पोटाश अच्छी मात्रा में निकलता है वे घुलनशील पोटाश की मात्रा कम करके पोटाश घोलक बैक्टीरिया का प्रयोग कर सकते हैं.

बेसल डोज में ५-५ किलो (प्रति एकड़) फेरस सल्फेट. जिंक सल्फेट और मैग्नीशियम सल्फेट का प्रयोग इन सूक्ष्मतत्वों की कमी से फसल को बचाता है और सुल्फर की भी पूर्ति करता है. बेसल डोज में बोरोन (बोरेक्स या टेट्राबोरेट रूप में) प्रयोग करना चाहिए.

तरबूज के बीज में फंगल इन्फेक्शन बहुत आम बात है. इसके निदान के लिए कंपोस्ट में मिला कर ट्राईकोडरमा का प्रयोग बहुत प्रभावी साबित होता है.

तरबूज में बहुत ज्यादा हैवी कीटनाशकों के प्रयोग से बचाना चाहिये. इसमें फल बनने के लिए कीट (खासतौर पर मधुमक्खियों द्वारा) परागण बहुत जरुरी होता है, क्योंकि नर और मादा फूल अलग अलग होते हैं.

तरबूज में लगने वाली फलमक्खी भी एक बड़ा खतरा होता है. इसके प्रकोप से फल सडन, फलों का छोटा और टेड़ा मेढ़ा हो जाने जैसी समस्याएं आती हैं. फल मक्खी का नियंत्रण फेरोमोन ट्रैप द्वारा, बिना पेस्टीसाइड आसानी से किया जा सकता है.

 

…..क्रमशः

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