चना भारत की प्रमुख दलहन फसल है. इसका प्रयोग दाल निर्माण, बेसन और नमकीन उद्योग में होता है. अरब देशों को निर्यात होने के कारण डॉलर चना चना किसानों के लिए अच्छी आय का स्त्रोत बनकर उभरा है.

सभी दलहनी फसलों की तरह चना भी प्रोटीन से भरपूर फसल है , इसी कारण कई प्रकार के कीट और फफूंद का प्रकोप इस फसल पर होता है. सहजीवी जीवाणु, राइजोबियम के कारण इस फसल के लिए अवशयक नाइट्रोजन की पूर्ति वायु द्वारा ही हो जाती है, बशर्ते बीजों को उपयुक्त राइजोबियम कल्चर से उपचारित किया गया हो. राइजोबियम, फ़र्टिलाइज़र की बचत तो करता ही है, साथ ही फसल के जीवनचक्र को प्रभावित करता है और अच्छी पैदावार के लिए अहम् भूमिका निभाता है. चने के बीजोपचार के समय फास्फोरस और पोटाश घोलक सूक्ष्मजीवों का प्रयोग भी किया जा सकता है. ये सूक्ष्मजीव भूमि में पड़े अघुलनशील फोस्फोरस और पोटाश को घुलित रूप में परिवर्तित करके पौधों को उपलब्ध करवाते हैं.

दुनिया भर में, चने की फसल में फफूंद का प्रकोप प्रमुख समस्या है. विभिन्न प्रकार के लगभग २३ फफूंद चने की फसल पैर आक्रमण करने के लिए जाने जाते हैं, जिसमे से ज्यादा नुकसान जड़ों को संक्रमित करने वाले फफूंद से होता है.

जड़ों को फफूंद के प्रकोप से बचाने के लिए बीजोपचार के समय अच्छी गुणवत्ता के ट्राईकोडर्मा फफूंद का प्रयोग किया जाना चाहिए.

 

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