कॉटन बोल (ड़ेंडू) को नुकसान पहुँचाने वाले कई प्रकार के लार्वा हैं जो कॉटन बोल के भीतर पाए जा सकते हैं, जैसे कॉटन टिप वर्म, डाइसाईलोमिया मोथ का लार्वा, पिंक स्कावंजेर कैटरपिलर मोथ का लार्वा, और सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला पिंक बोल वर्म का लार्वा.

वर्तमान समय में पिंक बोल वर्म कपास के किसानों के लिए सबसे नुकसानदायक पेस्ट है. यह कॉटन की फसल लगभग पूरी तरह से बर्बाद करने की क्षमता रखता है. पिंक बोल वर्म का प्रभाव तापमान और नमीं से सीधे सम्बद्ध है, जो फसल की उम्र के साथ बढ़ता जाता है.

पिंक बोल वर्म (चित्र साभार; वेंडी मूर)

पिंक बोल वर्म का जीवन चक्र चार हिस्सों में बटा होता है. यह चार अवस्थाएं हैं, अंडे, लार्वा, प्यूपा और वयस्क. पिंक बोल वर्म यानी पेक्टिनोफोरा गोसीपिला के अण्डों से 3 से 4 दिन में बच्चे (लार्वा) निकाल जाते हैं. शुरुआती अवस्था में यह लाल व सफेद रंग के होते हैं जिनका मुख भूरे कलर का होता है. यह लार्वा कॉटन के फूलों और ड़ेंडू को अपना निशाना बनाते हैं. लार्वा तेजी से ड़ेंडू में छिद्र कर घुस जाता है. लार्वा अवस्था आगे विकसित होने के साथ उसका रंग केसरिया होता है जो अंतिम, यानी चौथी लार्वल अवस्था में लाल रंग का हो जाता है. लार्वा कॉटन बॉल में छेद करके बीजों को खाता है यह बोल के भीतर एक बीज से दूसरे बीज पर हमला करता है और बीच में पड़ने वाले कॉटन फाइबर को भी कुतर जाता है ताकि रास्ता बनाया जा सके.

चित्र अमेरिकी कृषि विभाग के सौजन्य से

पिंक बोल वर्म जब बॉल में घुसने के लिए छिद्र बनाता है तो इस छिद्र से अन्य कीट, फफूंद आदि भी कॉटन बॉल के भीतर जाकर उसे नुकसान पहुंचाते हैं. बारिश का पानी छिद्र से अंदर जाकर नुकसान की क्रिया को और तेज कर देता है. लार्वा से प्यूपा बनने के लिए जब यह कॉटन बॉल से बाहर निकलता है तो भी यह कॉटन के रेशों को काटता हुआ रास्ता बनाता है.

लार्वा अवस्था पूरी होने में 12 से 15 दिन का समय लगता है और इसके बाद इसकी प्यूपा अवस्था शुरू होती है. प्यूपा अवस्था ज़मीन ज़मीन की ऊपरी सतह पर (३-४ इंच गहराई पर) पूरी होती है. इस अवस्था में यह अक्रियाशील-अगतिशील रूप में पड़ा रहता है. प्यूपा भूरे रंग का, लगभग आधा इंच लंबाई का होता है. प्यूपा अवस्था को वयस्क अवस्था में रूपांतरित होने में 8 दिनों का समय लगता है. वयस्क का रंग मैटेलिक भूरे ग्रे कलर का होता है, पंखों पर गहरे धब्बे और सुनहरे भूरे बाल नुमा रचनाएं होती हैं.

प्यूपा से वयस्क कीट बनने के 2 से 3 दिन में निषेचन की क्रिया होती है. अंडों का विकास मादा माथ के शरीर के भीतर होता है और इसके बाद यह अंडा देने का काम शुरु करती है. मादा कॉटन बोल के नीचे की पत्तियों के बीच एक-एक या छोटे समूहों में अंडे देती है. इसके अंडे बहुत छोटे होते हैं और बिना लेंस के देखना कठिन काम है. 10 दिनों के भीतर यह अपने अधिकतम अंडे दे चुकी होती है. अंडे देने की जगह कॉटन बॉल के नीचे की दो पत्तियां होती है.

मोटे तौर पर, गर्म मौसम में पिंक बोलवर्म की पूरी जीवन चक्र 1 महीने में पूरा होता है. कॉटन की 1 फसल में में इनके 1 से 4 जीवन चक्र पूरे हो सकते हैं. कॉटन के पौधों की तलाश में एडल्ट ज्यादातर रात्रि के समय उड़ान भरते हैं, रात 12:00 से 3:00 बजे के बीच. क्योंकि इस समय तापमान और हवा की गति मध्यम होती है . अगर 10 दिन के भीतर इन्हें अंडे देने के लिए उपयुक्त कलियां फूल या बॉल नहीं मिले तो यह बिना अगली पीढ़ी को जन्म दिये ही मर जाते हैं.

पिंक बोल वर्म की दूसरी पीढ़ी (जो खेत में ही तैयार होती है ), कॉटन के फूल की पंखुड़ियों पर ही अंडे दे देती है. पिंक बोलवर्म का लार्वा फूलों के ऊपर रेशमी धागे का निर्माण कर गुलाब की कलियों जैसी संरचना यानी रोसेट लक्षण दिखाता है. इस अवस्था में लार्वा पराग कणों और फूल के अन्य हिस्सों को खाकर पोषण प्राप्त करता है जिससे एक सामान्य कॉटन बॉल का निर्माण प्रभावित होता है.

वयस्क पिंक बोल वर्म लगभग एक से दो महीने तक जीवित रहता है और कॉटन की पत्तियों के नीचे की नेक्टर ग्रंथियों से निकलने वाले स्त्राव से अपना भोजन प्राप्त करता है. मादा पिंक बोल वर्म का वयस्क सेक्स फेरोमोन का निर्माण करके नर को अपनी ओर आकर्षित करती है. अब यही सेक्स फेरोमोन इस कीट को नष्ट करने का हथियार बन चुका है. पिंक बोल वर्म का सेक्स हार्मोन लेबोरेटरी में कृत्रिम रूप से संश्लेषित किया जा सकता है और छलावे के तौर पर इसका प्रयोग करके नर कीटों को ट्रैप करके मादा से मिलन को रोका जा सकता है. इस प्रकार बिना पेस्टीसाइड का इस्तेमाल किए इनकी पीढ़ी को बढ़ने से रोका जा सकता है. प्रति एकड़ 8 से 10 फेरोमोन ट्रैप का इस्तेमाल करके निषेचन को प्रभावी तौर पर रोका जा सकता है. अगर आसपास के कई किसान मिलकर यह काम समूहों में करते हैं तो इसके परिणाम और भी बेहतर मिलते हैं.

तापमान ठंडा होने और दिन की लंबाई घटने के साथ साथ के साथ पिंक बोल वर्म अगले साल तक बचे रहने की तैयारी करता है. यह अंतिम लार्वा अवस्था से प्यूपा बनने की जगह इसी अवस्था पर रुक जाता है. विपरीत परिस्थितियों में बचने के लिए यानि अब अगली फसल तक का समय पूरा करने के लिए कॉटन बोल वर्म की चौथी अवस्था यानी चौथा इन्स्टार, मिट्टी और कॉटन की फसल के अपशिष्ट में बचा रहता है जो उपयुक्त मौसम आने पर फिर से एडल्ट बनने की क्रिया शुरू करता है. विपरीत मौसम में बचे रहने के लिए यह अपने चारों और रेशमी धागे से कोकून का निर्माण करता है.

नियंत्रण: पिंक बोल वर्म Bt प्रोटीन के लिए संवेदनशील होता है. यानि Bt कॉटन पर इसका प्रकोप कम या नहीं होना चाहिए. परन्तु Bt से प्रतिरोध विकसित हो जाने के कारण अब इसका प्रकोप बढ़ रहा है. जैविक नियंत्रण के लिए बेसिलस थूरिन्गेंसिस, बेसिलस सिरस बैक्टीरिया; बवेरिया बस्सिअना और मेटारैजियम नामक फंगस इस कीट के लार्वा पर प्रभावी पाई गयी है. हालाँकि सही डोज और उत्पाद में सही cfu संख्या कीट नियंत्रण के लिए बहुत जरुरी है.
समेकित प्रबंधन के लिए फेरोमोन ट्रैप, सूक्ष्म जीव, पोषण प्रबंधन, कम्पोस्टिंग आदि सभी उपायों का प्रयोग होना चाहिए.

बचाव: पुरानी फसल के अपशिष्ट को अच्छी तरह कम्पोस्ट किया जाना चाहिये. खेत में कम्पोस्ट और मित्र सूक्ष्म जीवों की संख्या गुलाबी बोल वर्म के प्यूपा को नष्ट कर अगली पीढ़ी का प्रभावी नियंत्रण करती है.

पौधों को पर्याप्त पोषण (मुख्य पोषक और सूक्ष्म पोषक) मिलता है तो वे भी कीटों से लड़ने के लिए तैयार रहते हैं. खेत के चरों ओर मक्का जैसी ऊँची फसल बहार से आने वाले मोथ को रोकने और प्रतिकर्षित करने में सहायक हो सकती है.

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Bacter Method of Scientific Farming

रासायनिक कीटनाशी- इनका कोई ख़ास असर नहीं देखा गया. चूँकि यह लार्वा बोल के अंदर सुरक्षित रहता है , इसपर कीटनाशको का प्रभाव अत्यंत कम होता है. अत्यधिक संख्या में एडल्ट मोथ दिखने पर ओर्गानिफोस्फोरस पेस्टिसाइड का छिडकाव किया जा सकता है जो कई तरह के कीटों को नष्ट कर देता है.

 

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