व्हाइट ग्रब, स्क्रैब बीटल नामक कड़े काइटिन कवच वाले कीट के होते हैं. यह नाम कुछ-कुछ क्रैब से मिलता-जुलता है यानी केकड़े के जैसे दिखने वाले कीड़े. स्क्रैब बीटल की लगभग   30,000 प्रजातियां पाई जाती है.  विभिन्न प्रजातियों के लार्वा कम-ज्यादा मात्रा में पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं.  स्क्रैब बीटल  यानी गोबर कीड़े की एक प्रजाति (स्क्रेबस सैकर) को मिस्र में सूर्य देवता के प्रतिनिधि के तौर पर पवित्र माना जाता था. उन्होंने इसे सूरज की गेंद को धक्का देने वाले देवता का प्रतीक माना.

वास्तविक व्हाइट ग्रब  फिलोफेगा (इसका शाब्दिक अर्थ है- पत्ती खाने वाले) नामक परिवार के स्क्रैब होते हैं. इनकी लगभग 900 प्रजातियां होती हैं इनमें से लगभग 200 प्रजातियां पौधों के लिए विशेष नुकसानदायक मानी गई है. फिलोफेगा परिवार के सदस्यों को मई  बीटल,  जून बीटल  या मई-जून  बीटल भी कहा जाता है. जापानी बीटल के  लार्वा को भी नुकसानदायक व्हाइट ग्रब माना जाता है.

नुकसानदायक व्हाइट ग्रब के लार्वा मुड़े हुए आकार यानि कोमा के आकार के होते हैं.

पहचान

आपने घरों और खेतों के आसपास अनेक प्रकार के बीटल देखे होंगे. नीचे के चित्र में दिख रहे इन सभी बीटल के लार्वा नुकसानदायक व्हाइट ग्रब कहलाते हैं.

 

बड़े आकार की प्रजाति का एडल्ट स्क्रैब बीटल यानि गुबरैला

छोटे आकार की प्रजाति का एडल्ट स्क्रैब बीटल यानि गुबरैला

एडल्ट मई जून बीटल

एडल्ट मई जून बीटल

एडल्ट बीटल

होस्ट और जीवन चक्र

व्हाइट ग्रब लगभग हर तरह के पौधे  की जड़ को अपने भोजन की तरह प्रयोग कर सकता है.  जून बीटल घास कुल के पौधे यानी मक्का, बाजरा इत्यादि को ज्यादा पसंद करता है. मूंगफली, आलू, कपास, दलहन, गन्ना, बैंगन, कद्दू वर्गीय फसलें, भिंडी, मूंग आदि  तथा जल्दी बोई गई रबी फसलें  व्हाइट ग्रब का शिकार बन सकती हैं.

प्राकृतिक रूप से व्हाइट ग्रब नीम बेर खेजड़ी अंगूर अमरूद सुरजना, आम, बबूल, जामुन, इमली, फालसा, अनार, करौंदा, अंजीर, आदि पौधों पर आश्रित होता है परंतु मुख्य रूप से नीम, सुरजना और इमली इन्हें खास पसंद है. स्थानीय पेड़ पौधों के अनुसार व्हाइट ग्रब की पसंद भी बदल जाती है.

इनका जीवन चक्र 1 साल में पूरा होता है  जबकि स्क्रब बीटल के  कुछ सदस्यों का जीवन चक्र पूरा करने के लिए 3-4 वर्ष तक का समय लगता है. मई जून के महीने में संध्या काल में निषेचन के उपरांत मादा भूमि में 1 इंच से 8 इंच गहराई पर एक बार में 15 से 20 अंडे देती है. एक सीजन में मादा ६० से ७५ अंडे देती है.

वयस्क बीटल को बड़े पेड़ों की पत्तियां प्रिय है इसलिए यह पेड़ों के आसपास ज्यादा मात्रा में अंडे देते हैं, खासतौर पर नीम, इमली, खेजड़ी और बाबुल के पेड़ों के नीचे. अंडे से लार्वा निकलने के लिए लगभग 3 हफ्तों का समय लगता है. अंडों से निकलने के बाद लार्वा पौधों के सड़ते हुए अंश और जड़ों को खाकर अपनी लंबाई और वजन ५ गुना तक बढ़ाता है.

ठण्ड आने के पहले दो बार मोल्टिंग की क्रिया होती है. तीसरी लार्वल अवस्था लगभग ९ महीने की होती है, जिसके बाद प्यूपा अवस्था आती है. ठंड आने पर लार्वा जमीन में लगभग डेढ़ मीटर गहरे तक चला जाता है, और बसंत आने का इंतजार करता है. वसंत आने पर जब यह फिर से  बाहर आता है तो फसलों का और ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.  अगले वर्ष फिर से यही क्रम चलता है. फसलों में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली प्रजाति को  लार्वा से वयस्क बनने में 3 वर्ष तक का समय लग सकता है. परिपक्वता के समय यह ग्रब अपने चारों ओर मिट्टी का कवच बनाकर प्यूपा अवस्था में चले जाते हैं, जिससे  कुछ हफ्तों में वे अंततः वयस्क कीट में परिवर्तित हो जाते हैं.  यह व्यस्त  कीट  अनुकूल मौसम,  यानी मई-जून आने तक जमीन में ही छिपे रहते हैं.

गुबरैले की प्यूपा अवस्था

मैनेजमेंट

जिस वर्ष  एडल्ट  बीटल ज्यादा मात्रा में  दिखाई पड़े उसके अगले वर्ष सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना होती है.  इस तरह के परिस्थिति आने पर ज्यादा गहरी जड़ों वाली  फसलें लगाना उचित रहता है.  और खेत के बीच खरपतवार,    खास तौर पर घास कुल के पौधों को को समय-समय पर निकलवाना चाहिए. घास कुल के पौधे इस बीटल के  अंडे देने के लिए पसंदीदा जगह होती हैं. ठंड और वसंत के समय की जुताई बहुत से व्हाइट ग्रब को नष्ट कर देती है .

जमीन में इनकी उपस्थिति देखने के लिए गहरी सिंचाई विधि अपनाई जा सकती है. पानी इनकी सुरंग में भरने पर ये बाहर निकल आते हैं.

शाम के समय खेतों में प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करके वयस्क बीटल को सम्भोग करने और अंडे देने से पहले ही नष्ट किया जा सकता है.  वयस्क दिखाई देने पर नमी वाली जगहों के आसपास 7 से 8 दिन तक  प्रकाश प्रपंच का प्रयोग करके इन्हें प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है.

खेत के आसपास के पेड़ों पर कीटनाशक का छिड़काव करके वयस्क कीटों को नष्ट किया जा सकता है. कुछ प्रजाति के व्हाइट ग्रब को नीम आकर्षित करती है इसलिए नीम की डालियां जिन पर कीटनाशक छिड़काव किया गया हो व्हाइट ग्रब  की जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है.

ऑर्गेनिक मैटर से रहित हल्की मिट्टी में इनका प्रकोप बहुत ज्यादा देखने को मिलता है. हलकी मिटटी में  कोई अन्य खाद्य सामग्री नहीं होती इसलिए ऐसी मिट्टी में उगती हुई फसल व्हाइट ग्रब द्वारा ज्यादा नष्ट की जाती है.  खेत में डली हुई कच्ची खाद व्हाइट ग्रब को न्योता देती है, इसलिए खेत में हमेशा अच्छी तरह चढ़ी हुई कम पोस्ट की गई खाद का प्रयोग ही किया जाना चाहिए.

खेत के बाहर कच्ची खाद के ढेर लगाना भी इन कीड़ो को खेत से बाहर रखने का एक तरीका हो सकता है.

व्हाइट ग्रब के प्राकृतिक शत्रु कीट और जंतु

व्हाइट ग्रब के प्राकृतिक शत्रु इनके नियंत्रण के लिए प्रभावी विकल्प  हैं.

बिच्छू की तरह  दिखने वाले डंक (जो वास्तव में अंडे देने के लिए खास अंग है)  वाला ततैया  जो व्हाइट ग्रब के  शरीर में अपने अंडे देता है, इसकी जनसंख्या नियंत्रित करने के लिए काफी प्रभावी है, परंतु कीटनाशकों के प्रभाव से यह  ततैये  नष्ट हो जाते हैं, परिणाम स्वरुप व्हाइट ग्रब की संख्या बढ़ जाती है.

परजीवी वास्प के लार्वा के द्वारा नष्ट किया गया व्हाइट ग्रब का प्यूपा (पैरासिटोइड द्वारा खाया गया प्यूपा अपने मिटटी का कवच के साथ  चित्र में दिख रहा है)

जुताई के समय पक्षी लार्वा को खा कर नष्ट करने के कार्य में अपना सहयोग देते हैं. छछूंदर व्हाइट ग्रब को खाना पसंद करती है. मेंढक जैसे दिखने वाला खुरदुरी त्वचा का टॉड भी वयस्कों को खा जाता है.

सुक्ष्मजैविक विधि द्वारा नियंत्रण

गर्म और शीतोष्ण इलाकों मेटाराइजियम, बवेरिया, और  ठंडे इलाकों में कार्डीसेप्स नाम की प्राकृतिक  फफूंद व्हाइट ग्रब को अपना निशाना बनाती है. यह फंगस व्हाइट ग्रब के काइटिन कवच को नष्ट कर इसके पोषक तत्वों का अवशोषण कर लेती है.

बेसिलस  थुरिन्गिएन्सिस, बेसिलस पोपली और बेसिलस लेंटीमार्बस नामक परजीवी बैक्टीरिया के खास स्ट्रेन व्हाइट ग्रब  के नियंत्रण में प्रयोग किए जाते हैं. ये सूक्ष्मजीव व्हाइट ग्रब की आंत को निशाना बनाते हैं और पोषक तत्वों के लिए व्हाइट ग्रब को मर देते हैं.

खेत में भरपूर मात्रा में अच्छा कम्पोस्ट डालें, लाभकारी मित्र सूक्ष्म जीवों का प्रयोग करें. इसकी काईटिन नष्ट करने की ताकत लाभकारी है. सूक्ष्म पोषक, कम्पोस्ट और सूक्ष्मजीव डालकर पौधों की विभिन्न कीटों के प्रति प्रतिरोध क्षमता और री-जनरेशन क्षमता बढाई जा सकती है.

रासायनिक कीटनाशकों द्वारा व्हाइट ग्रब का नियंत्रण कठिन है और  इस के बचे हुए अवशेष फसल को मार्केट के लिए अनुपयुक्त बना देते हैं पिछले वर्ष राजस्थान में मूंगफली की फसल  अत्यधिक कीटनाशक प्रयोग होने के कारण एक्सपोर्ट नहीं हो पाई.  व्हाइट ग्रब के नियंत्रण के लिए रसायनों पर पूरी तरह निर्भरता किसान के लिए विनाशकारी हो सकती है.  फिर भी अगर कीटनाशकों का प्रयोग किया जाना है तो गहरी सिंचाई के साथ इनका प्रयोग ज्यादा प्रभावी होता है. खेत में भरपूर मात्रा में अच्छा कम्पोस्ट डालें, लाभकारी मित्र सूक्ष्म जीवों का प्रयोग करें. इसकी काईटिन नष्ट करने की ताकत लाभकारी है. सूक्ष्म पोषक, कम्पोस्ट और सूक्ष्मजीव डालकर पौधों की विभिन्न कीटों के प्रति प्रतिरोध क्षमता और री-जनरेशन क्षमता बढाई जा सकती है.

5 Comments

Mayur patel · 07/07/2018 at 10:58 AM

Can I copy this information for make the youtube video. ?

क्या मैं इस जानकारी को युट्यूब विडिओ के लिये कोपी कर सकता हूं?

    pushpendra · 09/07/2018 at 9:29 PM

    कर सकते हैं बशर्ते आप हमारी वेबसाइट का लिंक भी अपने youtube विडियो पर डालें

      Mayur patel · 09/07/2018 at 10:09 PM

      Thank you dear sir……

        pushpendra · 31/07/2018 at 12:50 PM

        🙂

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