थ्रिप्स का परिचय

थ्रिप्स बहुत छोटे कीट होते हैं। थ्रिप्स का सबसे पहला वर्णन फिलिपो बोनानी नामक कैथोलिक पादरी (1691) के कार्य में मिलता है. थ्रिप्स की लगभग 6000 प्रजातियां पाई जाती हैं, अधिकांश प्रजातियों को आँखों से देख कर अंतर कर पाना कठिन काम है। थ्रिप्स मुख्य रूप से पौधों का  रस चूस कर अपना पोषण प्राप्त करते हैं जबकि कुछ  थ्रिप्स अन्य थ्रिप्स और माइट्स परभक्षी भी होते हैं। थ्रिप्स की कुछ प्रजातियां परागकणों  का भोजन करती है और इस प्रकार कई पौधों में परागण का महत्वपूर्ण काम  भी करती  हैं। परंतु ज्यादातर  थ्रिप्स फसलों का महत्वपूर्ण परजीवी है। थ्रिप्स  कई प्रकार के फफूंद का भी भोजन करता है और फंगस के स्पोर्स को फैलाने का कार्य करता है। थ्रिप्स के पंख बहुत मजबूत नहीं होते और यह उड़ने के लिए हवा के झोंकों का प्रयोग करते हैं।

जीवन चक्र और पौधों को नुकसान

थ्रिप्स कोपलों, नई पत्तियों, कलियों और फूलों को अपना निशाना बनाती है। कपास, भिंडी, आलू, प्याज, मिर्च आदि  फसलों में थ्रिप्स का प्रकोप सर्वाधिक होता है।

मादा थ्रिप्स कोमल पत्तियों की सतह पर छोटे घाव बनाकर अंडे देती है. पौधे की अंदरूनी सतह में  दिए गए  अंडे पेस्टीसाइड स्प्रे से बचे रहते हैंप्रजनन के लिए सिर्फ मादा थ्रिप्स ही ही काफी होती है। अंडे से वयस्क थ्रिप्स बनने में 8 से 15 दिन का समय लगता है, इस प्रक्रिया में 5 बार रूपांतरण होता है।  पंखों की उपस्थिति वयस्क थ्रिप्स की पहचान है। वयस्क थ्रिप्स लगभग 45 दिन तक जीवित रहते हैं।

अंडा → प्रथम इन्स्टारद्वितीय इन्स्टार→  प्रोप्यूपाप्यूपावयस्क

थ्रिप्स की पहचान

फसल के पौधों में थ्रिप्स एक बड़ी समस्या बन कर उभरा है। यह अत्यंत छोटा कीट है जो फसल को काफी नुकसान पहुंचाता है। फसल में इसकी पहचान कठिन काम है। सामान्यत: किसान हथेली के पीछे के हिस्से में पत्तियों को झटक कर इसकी उपस्थिति का पता लगाने की कोशिश करते हैं। चूंकि त्वचा का रंग इस कीट के रंग से काफी मिलता-जुलता है इस कारण इसे पहचानना थोड़ा कठिन काम होता है। खासतौर पर उस वक्त जब यह कीट ज्यादा एक्टिव होता है यानी शाम का समय और रोशनी तिरछी पड़ती है। इस विधि में श्री पुरुषोत्तम जी पाटीदार रंगवासा ने मोबाइल फोन की स्क्रीन का इस्तेमाल गहरे काले बैकग्राउंड के तौर पर किया है। आजकल मोबाइल फोन हर किसान की जेब में रहता ही है बस इसकी स्क्रीन पर पत्तियों को झटक ने से thrips इस पर चलती हुई आसानी से देखी जा सकती है शाम के वक्त भी इस विधि में कोई कठिनाई नहीं आती ।

थ्रिप्स और वायरस

थ्रिप्स लगभग 20 प्रकार के वायरस का वाहक है।  टमाटर का स्पॉटेड विल्ट वायरस  इसका एक उदाहरण है; जो मूंगफली, तरबूज और कद्दू वर्गीय फसलों को अपना निशाना बनाता है। पाली हाउस और नेट हाउस  जैसी बंद जगहों पर  थ्रिप्स की भरमार हो जाती है क्योंकि  इन जगहों पर  थ्रिप्स के प्राकृतिक शत्रुओं की कमी होती है। अनियंत्रितअनावश्यक कीटनाशकों  का प्रयोग भी  थ्रिप्स के प्राकृतिक शत्रुओं का नाश कर देता है जिससे  थ्रिप्स की संख्या अत्यधिक बढ़ जाती है।

चित्र में थ्रिप्स द्वारा फैलाये हुए INSV वायरस से प्रभावित शिमला मिर्च और टमाटर के पौधों पर लक्षण को देख सकते हैं.

 

  

चित्र में थ्रिप्स द्वारा फैलाये हुए स्पॉटेड विल्ट वायरस से प्रभावित मिर्च के पौधों को देख सकते हैं.

थ्रिप्स का नियंत्रण

स्टिकी ट्रैप

फूलों की थ्रिप्स दुनिया में सबसे ज्यादा  फैलने वाली थ्रिप्स  की प्रजाति है  यह खास तौर पर  ग्रीन हाउस पाली हाउस आदि बंद जगहों पर अपना प्रकोप दिखाती है।  फूलों की थ्रिप्स  फूल के रंगों द्वारा आकर्षित होती है  मुख्य रूप से  पीले रंग की ओर।  नीले और सफेद रंग भी थ्रिप्स  को आकर्षित करते हैं।

नीले और पीले रंग के स्टिकी ट्रैप थ्रिप्स के प्रकोप को  कम करने में बहुत सहायक हो सकते हैं।

डिटर्जेंट, परजीवी फफूंद, नीम तेल और रासायनिक कीटनाशक

परजीवी फफूंद जैसे बवेरिया और वर्टीसिलियम  थ्रिप्स हर अवस्था पर  आक्रमण कर उसे नष्ट कर सकते हैं। बहुत से रासायनिक कीटनाशक थ्रिप्स को नष्ट कर सकते हैं परंतु दोनों ही उपायों में थ्रिप्स के छुपने की जगह तक इन उपादानों को पहुंचा पाना कठिन काम है.

अत्यधिक इंफेक्टेड डालियों को इन उपादानों के घोल में डुबाना एक बढ़िया तरीका हो सकता है परंतु अत्यधिक श्रम साध्य है.

उपादानों के साथ डिटर्जेंट का प्रयोग,  नीम तेल थ्रिप्स के  नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। एक बार पत्ती की सतह से गिर जाने पर  थ्रिप्स का पुनः  पौधे के सिरे पर पहुंच पाना कठिन  हो जाता है।

सुल्फर पाउडर की डस्टिंग भी थ्रिप्स के निदान के लिए अच्छा उपाय है, परन्तु कोमल पत्तियों को नुकसान पहुंचा सकता है इसलिए सावधानी से प्रयोग करना चाहिए.

 

थ्रिप्स को नियंत्रित रखने की बैक्टर विधि:

पौधों में मुख्य और सूक्ष्म पोषकों की कमी, असंतुलन भी रस चूसक कीटों द्वारा नुकसान को बढ़ावा देता है. अपने खेत की पोषण जरूरतें पूरी रखने पर इन कीटों से बचा जा सकता है. अच्छी तरह तैयार किया हुआ कंपोस्ट और पौधों के सहजीवी सूक्ष्म जीवों का प्रयोग भी पौधों की रोगों और कीटों से लड़ने की क्षमता बढाता है. नीम तेल का प्रयोग बीमारी को सीमित रखने में सहायक है.

bacter विधि  से उगाया जा रहा करेला (उम्र ३५ दिन)

नीचे के दो विडियो उपरोक्त वर्णित विधी से उगाई जा रहे प्याज और करेले पर कीटों और बीमारियों से प्रतिरोध दिखाते हैं.


आवश्यकता पडने पर सही रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग किया जाना चाहिये, परन्तु बिना जरुरत कीटनाशकों का प्रयोग बीमारियों को बढ़ावा देता है. ऐसे ही अत्यधिक फ़र्टिलाइज़र भी रोग बढ़ाते हैं.

करेले में थ्रिप्स से हुआ नुकसान (इस खेत में micronutrient और कंपोस्ट का प्रयोग नहीं किया गया है. बाकी सारे पोषक डाले गए हैं.)

आसपास के संक्रमित खेतो से आने वाले थ्रिप्स से भी अपनी फसल बचानी जरुरी है. नीचे के विडियो में यही प्रयास देख सकते हैं. पास के बुरी तरह संक्रमित भिन्डी से काफी मात्र में कीट और वायरस करेले के खेत में आ सकते हैं, जिससे बचने के लिए कीटनाशकों के साथ साथ पुरानी साड़ियों को ओट तैयार की जा रही है.


 

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