अरंडी की खेती

-पुष्पेन्द्र अवधिया 9926622048/7987051207

फसल परिचय:

कैस्टर (Ricinus communis) या अरंडी यूफोर्बिएसी परिवार का पौधा है जिसकी खेती इसके अखाद्य तेल के लिए की जाती है.
अरंडी ऊसर जमीन में खेती के लिए उपयुक्त फसल है. फसल की अवधि ४-५ महीने की होती है. भारत में यह फसल जुलाई अगस्त में बोई जाती है. अरंडी के तेल के बहुत सारे औद्योगिक प्रयोग हैं.

भारत अरंडी का सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक देश है. २००९-१० में इसका भरत से निर्यात ३.४५ लाख मीट्रिक टन था. अरंडी के तेल की सबसे ज्यादा खपत चीन में होती है. विश्व के कुल उत्पादन की लगभग ५०% खपत चीन में ही होती है.

भारत की भूमि अरंडी के उत्पादन के लिए उपयुक्त है. भारत में अरंडी का उत्पादन दुनिया के उत्पादन से ३०% ज्यादा आता है. बाकी दुनिया का औसत उत्पादन १० क्विंटल प्रति हेक्टेयर आता है जबकि भारत में यह १.३ टन प्रति हेक्टेयर आता है.

भारत में अरंडी की किस्में

शोध के उपरान्त अरंडी की कई उन्नत और हाइब्रिड किस्मे खेती के लिए उपलब्ध हैं. राज्यवार अलग अलग किस्में उपलध हैं, जैसे तमिलनाडु में वर्षा आधारित खेती के लिए TMV-5 और TMV-6 किस्में हैं वहीँ TMVCH-1 और YRCH-1 हाइब्रिड भी असिंचित खेती के लिए उपयुक्त हैं. गुजरात में असिंचित खेती के लिए GAUCH-1, GCH-1, GCH-2,GCH-4, GCH-5, GCH-6 एवं GCH-7 हाइब्रिड किस्मे अनुशंषित की जाती हैं. इन किस्मों का उत्पादन २०-३५ क्विंटल प्रति हेक्टेयर आता है.

भारतीय तिलहन अनुसन्धान केंद्र द्वारा सम्पूर्ण भारत के लिए अनुशंषित हाइब्रिड निम्नलिखित है-
ज्वाला 48-1 (किस्म ) – 48% तेल . १०-२० क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार. विल्ट और कैप्सूल बोरर प्रतिरोधी एवं जेसिड और botrytis के लिए टोलेरेंट है.
DCH-519 (हाइब्रिड)– 50% तेल. १७-२१ क्विंटल प्रति हेक्टेयर पैदावार. फुजेरियम विल्ट और टिड्डो के लिए रेसिस्टेंट.

स्पेसिंग

सामान्यतः वर्षा आधारित खेती में अरंडी की किस्म (ओपन) में पौधों की २ फीट by ३ फीट की स्पेसिंग में बोई जाती है जबकि वर्षा आधारित खेती में हाइब्रिड के लिए ३ फीट by ४ फीट का फासला रखा जाता है. सिंचित खेती में अरंडी की किस्म (ओपन) अगर बो रहे हैं तो ३ फीट by ३ फीट का फासला रखा जाता है जबकि हाइब्रिड में ४ फीट से ५ फीट का फासला रखा जाता है.

भारी मिट्टी में स्पेसिंग बढाई भी जा सकती है जबकि जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए स्पेसिंग कम रखनी चाहिए.

एक बीज ४-6 cm की गहराई पैर लगाना चाहिए.

खेत की तैयारी

बुवाई के ठीक पहले अच्छी मात्रा में कंपोस्ट डालें. पौधे उगने के बाद भी उनके आस पास कंपोस्ट डाला जा सकता है. कंपोस्ट के विषय में अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें. सूक्ष्म जैविक विधि से तैयार कंपोस्ट कई प्रकार से लाभदायक है. साथ ही लाभदायक सूक्ष्मजीवों सूक्ष्म पोषक तत्वों और रासायनिक/जैविक fertilizers समुचित प्रयोग करके अधिकतम पैदावार ली जा सकती है. हर फसल की तरह अरंडी को भी नाइट्रोजन, फोस्फोरस और पोटाश की उचित मात्रा की आवश्यकता होती है. कम खर्चे में समुचित पोषण प्रबंधन और लाभदायक सूक्ष्मजीवों अधिक जानकारी के लिए 9926622048 पर whatsapp कर सकते हैं.

अरंडी की फसल की प्रमुख समस्याएं

कीट जनित समस्याएं

लीफ़ माइनर, सेमीलूपर, कई प्रकार की इल्लियाँ, कैप्सूल बोरर, जेसिड, थ्रिप्स और सफ़ेद मक्खी अदि अरंडी के प्रमुख पेस्ट हैं. प्रभावित इलाकों में रेसिस्टेंट वेरायटीज का चुनाव करना चाहिए. समस्या जितनी जल्दी पहचान में आ जाये नियंत्रण उतना ही आसान होता है.

फफूंद जनित समस्याएं

फुजेरियम विल्ट, नवोद्भिद ब्लाइट, और पाउडरी मिल्ड्यू प्रमुख फंगस जनित रोग हैं. Alternaria ब्लाइट, सर्कोस्पोरा लीफ़ स्पॉट भी फसल को नुकसान पहुंचाते हैं.

लाभदायक सूक्ष्मजीवों से बीजोपचार और अच्छे कंपोस्ट के प्रयोग से इन फंगस जनित रोगों का सफलता पूर्वक नियंत्रण किया जा सकता है. सूक्ष्मजीवों द्वारा रोग नियंत्रण की अधिक जानकारी के लिए 9926622048 पर whatsapp कर सकते हैं.


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