करेला

करेला आर्गेनिक मेटर से भरपूर मिट्टी जिसका पी एच मान 6-6.5 हो, में भरपूर पैदावार देता है.

करेले की खेती के लिए खेत की जल निकासी व्यवस्था अच्छी होनी चाहिये, वरना जलभराव के कारण उत्पादन प्रभावित होता है और पौधे मर भी सकते हैं.

बुवाई के समय बैक्टीरिया विधि से निर्मित कंपोस्ट और वर्मी कंपोस्ट प्रति गल (pit) में डालें (मात्रा 200 ग्राम). इससे बीजों का अंकुरण बेहतर होता है, और पूरे समय पौधे स्वस्थ बने रहते हैं और भूमि जनित कीट और नेमाटोड भी नियंत्रण में रहते हैं. ड्रिप विधि से लगे पौधों में ड्रिप द्वारा लाभदायक सूक्ष्म जीव Azotobacter और Trichoderma का प्रयोग करना चाहिए. बिना ड्रिप के खेत में drenching विधि से पंप द्वारा ये कल्चर प्रयोग किये जा सकते हैं. ३-४ पत्ती की अवस्था में फोस्फेट घोलक और पोटाश घोलक सूक्ष्म जीवों  का प्रयोग किया जाना चाहिये.

बेसल (फसल बुवाई के पहले खेत में डाली जाने वाली खाद) में सुपर फॉस्फेट, 18-46-0 और MOP का प्रयोग आयरन जिंक और मैग्नीशियम सल्फेट के साथ किया जाना चाहिये. खेत में १० टन गोबर खाद या ४ टन बैक्टीरिया कंपोस्ट डालना चाहिए.

ड्रिप विधि से लगे हुए पौधों में पोषण की समुचित व्यवस्था की जा सकती है. यह अच्छे उत्पादन का आधार है. दिए गए पोषकों का पौधे समुचित इस्तेमाल कर सकें इसलिए मित्र सूक्ष्म जीवों की आवश्यकता होती है.

करेले में आने वाली प्रमुख समस्याएँ फफूंद जनित (विल्ट, पाउडरी मिल्डिउ, डाउनी मिल्डिउ) हैं. समय समय पर फफूंद रोधी सूक्ष्मजीवों का स्प्रे इन समस्याओं से बचाता है.

रस चूसक कीट, फ्रूट फ्लाई और बीटल करेले की फसल के प्रमुख परजीवी कीट हैं. इनसे बचाव के लिए फ्रूट फ्लाई फेरोमोने ट्रैप, येलो स्टिकी ट्रैप, ब्लू स्टिकी ट्रैप और नीम तेल (1500-3000 पी पी एम) का प्रयोग लाभकारी होता है.

 

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