पपीता अच्छा रिटर्न देने वाली बागवानी फसल है.

गर्म इलाकों में यह लगभग १ वर्ष चलती है, और अनुकूल जलवायु में २-३ साल भी चल जाती है, परन्तु बढती उम्र के साथ उत्पादन की मात्रा और क्वालिटी कमजोर होती जाती है.

मीठे स्वाद के मार्केटेबल पपीते को गूदे के रंग के आधार पैर मुख्यतः दो मूल किस्मों में बांटा जा सकता है; पीले गूदे वाली और लाल-नारंगी गूदे वाली किस्मे. लाल-नारंगी गूदे वाली किस्मे ज्यादा आकर्षक और स्वादिष्ट समझी जाती हैं और अच्छी मार्केट डिमांड होती है. फिलहाल इसका बीज भारत में आयत किया जाता है.

पपीता के पेड़ो के लिंग अलग अलग होते हैं. इस आधार पैर भी किस्मों का वर्गीकरण किया जाता है. द्विलिंगी और मादा पौधे ही फल उत्पादन के लायक होते हैं. परन्तु खेत में कई नर पौधे (सिर्फ नर मादा पौधों वाली किस्म में) या कुछ द्विलिंगी पौधों का होना जरुरी है. लाल-नारंगी गूदे वाली किस्मों में द्विलिंगी पौधे बहुतायत में होते हैं, जबकि पीली किस्मों में इनकी जगह नर पौधे होते हैं. ज्यादा नर पौधे खेत की पैदावार को कम कर देते हैं.

पपीते की खेती के लिए नर्सरी की तैयारी करनी होती है. करीब ४०-६० दिन के पौधे खेत में रोपाई के लिए उपयुक्त होते हैं. नर्सरी की अवस्था में ही पौधों को लाभदायक सूक्ष्मजीवों से उपचारित करना अच्छे परिणाम देता है.

रोपाई के पहले खेत में अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद, सुपर फॉस्फेट, और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स खेत में डालने चाहिए.

…क्रमशः

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