प्रकृति अनुकूल खेती (Pro-Nature Agriculture)

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Bacter® प्रकृति अनुकूल खेती Method of Pro-Nature Agriculture

कृषि कार्य जितना प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है उतना अन्य कोई व्यवसाय नहीं. कृषि में उन्नति के लिए खेती और प्रकृति के अंतरसंबंधों को समझना बहुत जरुरी है. सही विधियों की जानकारी तो आवश्यक है ही साथ में उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझना भी जरुरी है ताकि किसान खुद फ़ैसले लेने में सक्षम हो सकें.

ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सहन कर पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम संभव उत्पादकता दे सकती है. यह बात गांठ बांध लेने की है कि अगर खेत का पर्यावरण ठीक रहेगा तभी खेती लंबे समय तक चल पायेगी.

पर्यावरण में होने वाला नुकसान, खेती और किसान को ही सबसे बुरी तरह प्रभावित कर रहा है.आइये हम’ सब की भलाई के लिए विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.

यह विडंबना ही है कि ज्ञान विज्ञान में जारी उन्नति के बाद भी, कृषि कार्य विज्ञान के सीधे प्रभाव से लगभग अनछुआ रह गया. गाँव गाँव में सिर्फ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा निर्मित हानिकारक रसायनों की भरमार होती गई. ऐसा नहीं है कि ये रसायन पूरी तरह त्याज्य हैं परन्तु सिर्फ इन्हीं रसायनों के आधार पर खेती करना किसान, प्रकृति  और उपभोक्ता तीनों के लिए नुकसानदायक है. कई सालों तक किसानों के बीच काम करने के बाद यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं कि किसान समुदाय की वैज्ञानिक और पर्यावरण चेतना ना के बराबर है. बल्कि भारतीय समाज की ही वैज्ञानिक चेतना नहीं के बराबर है.

वैज्ञानिक चेतना के आभाव में किसान गैर जरुरी उत्पादों और अधिक उत्पादन के झूठे वादों वाली चमत्कारिक दवाओं में उलझकर रह जाता है. बिना जाने समझे कीटनाशकों और फफूंद नाशियों का गलत समय में प्रयोग न सिर्फ आर्थिक नुकसान का कारण है बल्कि पर्यावरण को भी बुरी तरह प्रभावित करता है.

कृषि कार्य प्रकृति और विभिन्न जीवों के बीच होने वाली क्रिया है. पौधे जीवित हैं. वे खनिज, पानी, हवा और प्रकाश उर्जा को, अन्य जीवों द्वारा प्रयोग किये जाने लायक तत्वों जैसे शक्कर, प्रोटीन, वसा और अन्य उपयोगी वस्तुओं में परिवर्तित करने में सक्षम है.

अपने जीवनकाल के दौरान पौधों को प्रकृति के बदलावों से सीधा मुकाबला करना होता है. पौधों के दोस्त और दुश्मन भी होते हैं, जिनका सामना वे अकेले ही करते हैं. पौधों कि इस लड़ाई के लिए जब मनुष्य का साथ मिल जाता है, तो उसे हम खेती करना कहते हैं.

सभी कीट, सभी सूक्ष्म जीव हानिकारक नही हैं. हमें मित्र कीटों और मित्र सूक्ष्म जीवों का समुचित प्रयोग करना सीखना चाहिये. कीट और सूक्ष्मजीव आज भी मानव के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी हैं, और सबसे बड़े वरदान भी.

‘बैक्टर’ कई सवालों के जवाब/समाधान ढूँढने पर काम करता है, जैसे;

  1. भूमि में अच्छी गुणवत्ता के आर्गेनिक मैटर यानि जीवांश की वृद्धि कम से कम खर्च में किस प्रकार संभव है?
  2. अलग-अलग प्रजाति के पौधों के लिए कौन कौन से पोषक तत्व , किस किस रूप में  और कितनी मात्रा में जरुरी हैं? इन सबके आसान और सस्ते विकल्प क्या हैं?
  3. मिनिरल पोषक (जैसे आयरन, जिंक, मैग्नीशियम आदि)  कब कब प्रयोग करना चाहिये?
  4. कौन से पोषक एक दूसरे का प्रभाव कम करते हैं और कौन से पोषक एक दूसरे का प्रभाव बढ़ाते हैं?
  5. कौन से सूक्ष्म पोषक भूमि में डाले जाने चाहिए, और कौन से पोषक पत्तों पर स्प्रे करने चाहिए? क्या सूक्ष्म पोषक भी पौधों के लिए जहरीले होते हैं?
  6. पौधे की किन अवस्थाओं पर सूक्ष्म पोषकों का प्रयोग समुचित परिणाम देता है?
  7. कीट नियंत्रण के लिए प्रयोग किये जाने वाले कौन से रसायन बेहतर हैं और बिना घातक रसायनों के कम से कम प्रयोग द्वारा किस प्रकार रोगों का नियंत्रण किया जा सकता है?
  8. कीट के जीवन चक्र की किन अवस्थाओं पर ज्यादा प्रभावी नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है?
  9. कौन कौन से सूक्ष्मजीव फसलों के लिए घातक हैं? और उन्हें किस प्रकार सीमित किया जा सकता है?
  10. पोषक तत्वों को प्राप्त करने के लिए सूक्ष्म जीव किस प्रकार किसान के सहायक हैं? इन्हें किस प्रकार कम से कम जटिलता के अधिकतम प्रभाव के लिए प्रयोग किया जा सकता है?
  11. सहजीवी/मित्र सूक्ष्मजीवों और पौधों के बीच के सम्बन्ध को किस प्रकार किसान की आय बढ़ाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है?
  12. मित्र सूक्ष्म जीव फसलों के पोषण प्रबंधन में किस प्रकार किसान के खर्चों को कम कर सकते हैं?
  13. रोगकारक सूक्ष्म जीवों, रोगकारक कीटों और मित्र सूक्ष्मजीवों के बीच की शत्रुता को किस प्रकार किसान के लाभ के लिए प्रयोग किया जा सकता है?

“प्रकृति अनुकूल कृषि” विधि की संकल्पना इन्हीं प्रश्नों के उत्तर पर आधारित है.


bacter की प्रकृति अनुकूल विधि से उगाई कुछ फसलें: