गन्ने का पोक्का बोईंग (Pokkah Boeng) रोग

sugarcane pokkah boeng
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पोक्का बोइंग (Pokkah Boeng) एक जापानी नाम है जिसका आशय मुड़े तुड़े शीर्ष से है. इस बीमारी में गन्ने कि शीर्ष वाली पत्ती डिसटॉर्ट (ख़राब) हो जाती है. गन्ने की तेज वृद्धि के समय या ज्यादा उमस और गर्मी के मौसम में इस बीमारी का प्रकोप बढ़ जाता है.

पोक्का बोईंग का कारण

Pokkah Boeng एक फफूंद जनित बीमारी है, जो हवा से फैलती है. इस बीमारी के कारक फफूंद का नाम फ्यूजेरियम मोनिलिफोर्मी (Fuserium moniliforme, नया नाम Fusarium verticillioides) और फ्यूजेरियम सबग्लूटीनेन्स (Fuserium subglutinans) है. फ्यूजेरियम मोनिलिफोर्मी मक्का सहित अन्य फसलों में भी रोग उत्पन्न करते हैं. धान की फसल का बकाने रोग इसी फ्यूजेरियम फंगस समूह से उत्पन्न होता है. फ्यूजेरियम सबग्लूटीनेन्स, गन्ने के अलावा मक्का, आम और पाईन एप्पल में भी रोग उत्पन करती है. फ्यूजेरियम परिवार के ये फंगस खेत और आसपास की घासों को भी संक्रमित करते हैं.

बिना कम्पोस्ट किया हुआ फसल अपशिष्ट इस बीमारी को फ़ैलाने के लिए खासा जिम्मेदार होता है. गन्ने और मक्के के खेतों में नीचे गिरी हुई संक्रमित पत्तियां, नमी के सान्निध्य में इस फगंस समूह के प्रजनन और जनसँख्या वृद्धि के लिए अनुकूल मौसम प्रदान करती हैं. बाद में यही स्पोर (फंगस के बीज या बीजाणु ) हवा की सवारी करके नए उग रहे पत्तों पर और नए नए खेतों में पहुँचती है.

एक बात ध्यान देने की है, जितने ज्यादा स्पोर नयी पत्ती पर गिरेंगे उतने गंभीर लक्षण दिखेंगे. यानी खेत में ज्यादा फंगस हो तो  ज्यादा सीवियर बीमारी हो सकती है. दूसरा पौधे को अगर पर्याप्त और संतुलित पोषण नहीं मिला है तो भी वह बीमारी से मजबूती से नहीं लड़ पायेगा और फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचेगा.

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पोक्का बोइंग से संक्रमित गन्ने का पौधा, ज्यादा नुकसान के लक्षण (चित्र: अनुज राठी जी, मुजफ्फर नगर  ने भेजा है)

पोक्का बोइंग (Pokkah Boeng) से नुकसान

पोक्का बोइंग (Pokkah Boeng) बीमारी सामान्यतः ज्यादा नुकसान नहीं पहुंचाती और इसका फैलाव अपने आप रुक भी जाता है. अगर गन्ने का सिरा इस फंगस से नष्ट नहीं हुआ है तो ज्यादा नुकसान कि संभावना नहीं होती. सिरा नष्ट होने पर भी कई बार बगल से नए शूट निकल आते हैं. इस बीमारी के नियंत्रण के लिए फफूंद नाशियों का प्रयोग कोई खास लाभकारी नहीं है क्योकि यह बीमारी खुद ब खुद सीमित हो जाती है और गन्ना अपने नुकसान की भरपाई करने में सक्षम है. हलाकि कुछ किसानों का कहना है कि कॉपर ओक्सी क्लोराइड के छिडकाव के अच्छे परिणाम मिले, वहीँ कई किसान कहते हैं कि बाजार में उपलब्ध रेगुलर फफूंद नाशियों का असर इस बीमारी पर कम होता जा रहा है.

इस बीमारी के नियंत्रण के लिए फफूंद नाशियों का प्रयोग कोई खास लाभकारी नहीं है क्योकि यह बीमारी खुद ब खुद सीमित हो जाती है और गन्ना अपने नुकसान की भरपाई करने में सक्षम है.

गन्ने की पोषण आवश्यकताओं की पूर्ती पर ध्यान देना और उसपर खर्च करना ज्यादा समझदारी वाला कदम रहेगा. यह ध्यान देने की बात है कि गन्ने कि कुछ किस्में इस बीमारी के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं जबकि कुछ किस्मों में इस बीमारी का प्रकोप कम होता है और वे ज्यादा सहनशील होती हैं.

मित्र सूक्ष्म जीवों का प्रयोग-

गन्ने कि कटाई के बाद गिरी हुई पत्तियों पर कम्पोस्ट करने वाले मित्र सूक्ष्म जीव या Trichoderma का छिडकाव करने से उन पत्तों में उपस्थित हानिकारक फंगस को सीमित किया जा सकता है. इस काम के लिए नमी की आवश्यकता होगी. बुवाई के समय Trichoderma से उपचार और टिलरिंग की अवस्था में भी इस मित्र फंगस का प्रयोग लाभकारी रहेगा. परन्तु फिर फफूंद नाशी रसायनों का त्याग करना पड़ेगा.

गन्ने और मक्के के खेत में समय समय पर Azotobacter, फॉस्फेट और पोटाश घोलक सूक्ष्म जीवों का भी प्रयोग किया जाना चाहिए. सुचारू पोषण भी पौधे की प्रतिरोध क्षमता विकसित करता है.

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पोक्का बोइंग से संक्रमित गन्ने का पौधा, कम नुकसान वाले लक्षण (चित्र: अनुज राठी जी, मुजफ्फर नगर ने भेजा है)

लेखक परिचय:

डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया (Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी)

विषय रूचिसूक्ष्मजीव विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जैव रसायन और प्रकृति अनुकूल टिकाऊ कृषि विधियां

कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये सब की भलाई के लिए विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.
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