धान (Paddy) की फ़सल के लिए सावधानियां

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आइये कुछ ऐसे क़दमों के विषय में जानें जिन्हें अपना कर आप धान (paddy) कि फसल में समस्याओं और खर्चों को कम कर सकते हैं साथ ही उर्वरता में वृद्धि के साथ अच्छी पैदावार भी हासिल कर सकते हैं. किसान बंधुओं का सवाल किया था कि धान में तरह तरह की बीमारियाँ लगती हैं, खास तौर पर कीटों की समस्या ज्यादा परेशान करती है. फ़िलहाल ज्यादातर किसान कीट नियंत्रण के लिए पेस्टिसाइड पर निर्भर रहते हैं, परन्तु लगातार स्प्रे के बाद भी मनोवांछित परिणाम नहीं मिल पाते, ऊपर से बदलता मौसम भी नई चुनौतियाँ सामने ला रहा है.


धान (paddy) के प्रमुख कीट

पीला स्टेम बोरर, भूरा, सफ़ेद और हरा हॉपर, leaf फोल्डर, गाल मिज, आर्मी वर्म, गंधीबग, हिस्पा, नीला बीटल, पत्ती और बाली की माईट आदि धान की फसल में लगने वाले प्रमुख कीट हैं, जिनकी पहचान के विषय में अलग से लिखना ज्यादा लाभकारी होगा.
यहाँ एक बात जानने की है कि इन सभी कीटों की जीवनशैली समझ कर उन्हें नियंत्रित करने के आसान और ज्यादा प्रभावी तरीके विकसित किये जा सकते हैं.


पेस्टिसाइड जरूरत पड़ने पर ही प्रयोग किये जाएँ, अंधाधुंध प्रयोग न करें.

ऊपर लिखे नुकसानदायक कीटों के प्राकृतिक विरोधी कीट प्रकृति में पाए जाते हैं. धान की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाने वाले कीट पीले स्टेम बोरर के लगभग 185 प्राकृतिक शत्रु ज्ञात हैं. लगभग हर कीट के प्राकृतिक शत्रु हैं जो खतरनाक पेस्टिसाइड के अनियंत्रित प्रयोग के कारण निशाना बनते हैं. मित्र कीटों के नष्ट होने से हानिकारक कीटों की संख्या बढती जाती है.


स्प्रे की जगह दानेदार पेस्टिसाइड को तरजीह दें

स्प्रे करने पर मित्र कीटों की ज्यादा हानि होती है. दानेदार पेस्टिसाइड, जड़ों और टिलर पर पहुंचकर अच्छा परिणाम देते हैं और मित्र कीटों को भी हानि नहीं पहुंचाते. किसान भाइयों को जानकारी होगी ही कि सरकार ने पारंपरिक रूप से धान की खेती में प्रचलित कई हानिकारक पेस्टिसाइड पर या तो प्रतिबन्ध लगा दिया है या फिर उन्हें अगले कुछ महीनो में प्रतिबंधित कर दिया जायेगा. ऐसे में दानेदार फिप्रोनिल एक अच्छा विकल्प है. यह systemic रूप से काम करता है यानी पौधे का रस चूसने वाले कीटों और पत्तियां या ऊतक का भक्षण करने वाले कीटों का अच्छा नियंत्रण दे सकता है. स्टेम बोरर और leaf रोलर के खिलाफ एमामेक्टिन बेन्जोएट के भी अच्छे परिणाम आते हैं. यह कीटनाशी एक फेर्मेंटेशन उत्पाद है, systemic कीटनाशी है जिसका पर्यावरण पर खास प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता. जरूरत पड़ने पर ETL के अनुरूप ही कीटनाशियों का प्रयोग करें.

मकड़ियाँ हैं किसान की परम मित्र

धान के खेत में पाई जाने वाली मकड़ियाँ हानिकारक कीटों को नियंत्रण में रखती हैं. यानी मकड़ियाँ किसान की मित्र कीट हैं. मकड़ियों के अलावा परजीवी ततैये कीटों के अण्डों को निशाना बना कर उनकी संख्या नियंत्रित रखते हैं. अत्यधिक तेज कीटनाशी इन मकड़ियों और अन्य मित्र कीटों का भी सफाया कर देते हैं. घातक पेस्टिसाइड से बचना इसलिए भी जरुरी है.


कीट नियंत्रण के लिए यलो ट्रैप, लाइट ट्रैप का इस्तेमाल करें

प्रकाश प्रपंच यानी लाइट ट्रैप कई तरह के मोथ को आकर्षित करता है. यलो स्टिकी ट्रैप हॉपर के लिए बहुत प्रभावी होता है बशर्ते सही समय पर लगा दिया जाये. धान के कुछ कीटों के लिए फेरोमोन ट्रैप विकसित करने की दिशा में भी काम चल रहा है.


यूरिया का अनावश्यक इस्तेमाल न करें, संतुलित पोषण पर ध्यान दें.

नाइट्रोजन फ़र्टिलाइज़र का अन्धाधुंध इस्तेमाल पौधों में रसीलापन बढ़ा देता है जिसके कारण फसल पर रस चूसक कीटों का हमला बढ़ जाता है. केवल यूरिया पर ध्यान देने कि जगह पोटाश और फॉस्फोरस के संतुलन पर भी ध्यान दें. एक ही बार में सारा डोज डालने की जगह उसे 2-3 हिस्से में विभाजित करके डालें.

सूक्ष्म पोषक तत्वों का समुचित प्रयोग करें

पौधों को मुख्य पोषण के साथ साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी आवश्यकता होती है. प्रमुख रूप से आयरन, मैग्नीशियम और जिंक जरुरी हैं. सूक्ष्म पोषकों की कमी से पौधे कई प्रकार से प्रभावित होते हैं और कीट प्रकोप बढ़ जाता है. उदाहरण के लिए जिंक की कमी से पौधों में मुक्त एमिनो अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है जिससे रस चूसक कीट ज्यादा संख्या में आकर्षित होते हैं. मैग्नीशियम प्रकाश संश्लेषण कि क्रिया के लिए सबसे ज्यादा जरुरी तत्व है.

फसल के अच्छे स्वास्थ्य के लिए मित्र सूक्ष्म जीवों को जगह दें

धान में लगने वाली फफूंद जनित बीमारी जिसे बकाने भी कहा जाता है Trichoderma नाम कि मित्र फंगस द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है. संतुलित पोषण द्वारा पौधे पर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा कर भी इस बीमारी से लड़ा जा सकता है. इसी प्रकार हवा से नाइट्रोजन फिक्स करने वाले सूक्ष्म जीव Azotobacter और Azosprillium का प्रयोग धान में करने से यूरिया पर निर्भरता को कम कर सकते हैं साथ ही खेत कि उर्वरता में भी बढ़ोत्तरी होती है. फॉस्फेट और पोटाश घोलक सूक्ष्म जीव पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में सहायक हैं.

धान (paddy) के खेत में अनावश्यक पानी न भरें

धान कि जड़ों को ज्यादा नमी चाहिए परन्तु लगातार पानी भरे रखने कि दरकार इसे नहीं होती. लगातार पानी भरने से खेत में हॉपर नाम के रस चूसक कीट का प्रजनन बढ़ जाता जाता है. इनकी बढ़ी हुई संख्या से खेत में काफी नुकसान होता है जिसे होपर बर्न के नाम s भी जाना जाता है.

बहुत ज्यादा घनी रोपाई से बचें

घनी फसल में होपर और अन्य रस चूसक कीटों कि भरमार हो जाती है. कीट प्रकोप से बचने के लिए घनी रोपाई से बचना चाहिए. हर 2-3 मीटर पर 30 cm गैप छोड़ना भी अच्छा विकल्प है. खेत के हवादार रहने से कीटों का फैलाव हम होता पाया गया है.

धान की अर्ली फसल लें, एक साथ बुवाई करें

अर्ली फसल में कीटों का प्रकोप लेट फसल कि तुलना में कम होता है. जैसे जैसे फसल कि उम्र बढती है उसपर कीटों का प्रजनन बढ़ता है जो लेट फसल को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. अगर आसपास के किसान मिलकर एकसाथ बुवाई करते हैं तो हानिकारक कीटों के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करें

भारत के कई राज्यों में खास रोगों के प्रति प्रतिरोधी किस्मे विकसित की गई हैं. अपने यहाँ के अनुरूप रोग रोधी किस्म का चयन करें, उदाहरण के लिए उड़ीसा में विकसित धान कि कनक किस्म और आंध्र प्रदेश में विकसित वज्रम किस्म भूरे होपर (BPH) के लिए प्रतिरोधी है.

लगातार धान की फसल न लगायें

लगातार धान लगाने से, एक ही खेत में धान कि 3-3 फसलें लेने से धान में लगने वाले कीटों कि संख्या में बेतहाशा वृद्धि होती है. इस परिस्थिति को उत्पन्न होने से रोकने के लिए धान की दो फसलों के बीच कोई और फसल जरूर लगायें.

धान के खेत में बचे अपशिष्ट को कम्पोस्ट करें

धान की कटाई के बाद बचे अपशिष्ट में कई प्रकार के कीटों के लार्वा, अंडे और प्यूपा बचे रहते हैं जो अगली फसल में काफी नुकसान पहुँचाने की क्षमता रखते हैं. इस अपशिष्ट का निपटान करने के लिए मित्र सूक्ष्म जीवों कि मदद ली जा सकती है. विस्तार से जानने के लिए यहाँ क्लिक करें.

लेखक परिचय:
डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया (Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी)

Pushpendra Awadhiya | Bacter | प्रकृति अनुकूल खेती|

विषय रूचि- सूक्ष्मजीव विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जैव रसायन और प्रकृति अनुकूल टिकाऊ कृषि विधियां
कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये सब की भलाई के लिए विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.
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