अदरक (ginger) की खेती की खास बातें

ginger bacter प्रकृति अनुकूल खेती
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अदरक (ginger) अच्छा मुनाफा देने वाली मसाला फसल है. अदरक (ginger) की खेती के लिए लगभग 12 इंच गहरी मिट्टी की जरुरत होती है. मिट्टी कि गहराई और पानी का उत्तम निकास अदरक की पैदावार को सीधे तौर पर प्रभावित करते हैं. अदरक के लिए जमीन का pH मान आंशिक रूप से अम्लीय यानी 6-6.5 के बीच होना चाहिए. आर्गेनिक मैटर यानी जीवांश की भरपूर मात्रा अदरक की खेती के लिए अत्यावश्यक है. सबसे अच्छा उत्पादन देने वाली किस्में IISR महिमा और IISR रेगिथा हैं. इनमें से रेगिथा में वाष्पशील सुगन्धित तेल और रेशे ज्यादा मात्रा में होते हैं. अदरक कि कई देशी और रिसर्च किस्में भी चलन में हैं.

अदरक के पौधों के बीच दूरी मायने रखती है.

अदरक की जड़ें काफी फैलती हैं, इसलिए पौधों के बीच (लाइन से लाइन और पौधे से पौधा) पर्याप्त दूरी रखी जानी चाहिये.

विकसित जड़ों के माध्यम से अदरक जमीन से अच्छी मात्रा में पोषक तत्वों का अवशोषण करता है. जमीन से अच्छी मात्रा में पोषक तत्व खींच लिए जाने के कारण बार बार एक ही जमीन में अदरक की खेती करने से पैदावार कम होती जाती है साथ ही तरह तरह के रोग बढ़ जाते हैं.

ज्यादा घना बोने पर पोषण की कमी के साथ साथ अदरक में गलन और पत्तियों कि फंगस की समस्या बढ़ जाती है.

अदरक (ginger) की प्रमुख बीमारियाँ: फंगस और निमेटोड

अदरक में लगने वाली प्रमुख बीमारियाँ निमेटोड का संक्रमण और फंगस जनित रूट रॉट हैं. इन दोनों के कारण अदरक कि फसल में व्यापक नुकसान होता है. निमेटोड का संक्रमण होने पर जड़ों का विकास अवरुद्ध होने के कारण पौधा ठीक ढंग से विकसित नहीं हो पाता फलतः ट्यूबर का आकार छोटा रह जाता है और कई बार पौधा असमय ही ख़त्म हो जाता है. जड़ों के फूले हुए हिस्से और इनका मालदार रूप रूट नॉट निमेटोड के संक्रमण की निशानी है.

ginger roots infected with root knot nematodes
अदरक की जड़ों में दिख रहे फूले और मालादार हिस्से रूट नॉट निमेटोड संक्रमण की निशानी हैं.
सूक्ष्मदर्शी में निमेटोड
सूक्ष्मदर्शी में निमेटोड

इस माइक्रो स्कोप विडियो में आप अदरक की बारीक जड़  में लिपटे और बेधने कि कोशिश करने वाले निमेटोड देख सकते हैं.

फंगस जनित सडन खेत में जल भराव के कारण बढती है और तेजी से फसल को ख़त्म कर देती है. कई बार ये दोनों बीमारियाँ एक साथ ही हमला करती हैं. दोनों बीमारियाँ ज्यादातर बीज यानी संक्रमित ट्यूबर से आती हैं, इसलिए बीज चुनाव के वक्त खासी सावधानी रखनी चाहिए.

नीचे चित्र में आप देख सकते हैं कि अदरक के ट्यूबर पर दिखने वाले धब्बे फंगस के संक्रमण कि निशानी हैं. जब इन धब्बों का सूक्ष्मदर्शी द्वारा परीक्षण किया गया तो फंगस के स्पोर (यानी फंगस के बीज) दिखाई दिए. खेत में रोपाई के बाद  इन धब्बों में उपस्थित फंगस के बीज उचित परिस्थितियों में उगना शुरू होंगे और अदरक के पौधे को अपना निशाना बनायेंगे. ऐसे धब्बे वाले बीज से बचा जाना चाहिए.

अदरक के कंद में फंगस के घाव और धब्बे
अदरक के कंद में फंगस के घाव और धब्बे
अदरक के धब्बे में उपस्थित फंगस के स्पोरfungal spores on ginger corm
अदरक के धब्बे में उपस्थित फंगस के स्पोर

फंगस से संक्रमित होने पर अदरक की कुछ ऐसी हालत हो जाती है:

फंगस जनित जड़ गलन
फंगस जनित जड़ गलन
अदरक (ginger) की खेती के लिए मित्र सूक्ष्मजीव

अदरक के ट्यूबर को लाभकारी मित्र सूक्ष्म जीवों से उपचारित करने से कई बीमारियों से बचाव होता है. मित्र सूक्ष्म जीवों के इस्तेमाल से जर्मिनेशन भी बेहतर और जल्द होता है. जड़ों का विकास तेज करने के लिए पीजीपीआर बैक्टीरिया और एजोटोबैक्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है. फुजेरियम नामक रोगकारक फफूंद का सामना करने के लिए ट्राईकोडर्मा नामक मित्र फंगस का इस्तेमाल किया जा सकता है. ट्राईकोडर्मा फंगस, अन्य फंगस को अपना भोजन बना लेती है.

अदरक के लिए अच्छा पोषण बहुत जरुरी है.

पोषक तत्वों के तौर पर अदरक को अच्छी मात्रा में नाइट्रोजन, फोस्फोरस और पोटाश कि जरुरत होती है. एक बार में डालने की जगह इन्हें बार बार देना फायदेमंद रहता है. नाइट्रोजन का इस्तेमाल बेसल डोज में नहीं करें बल्कि उगने के बाद इसे डालें.  

मित्र सूक्ष्म जीवों की उपस्थिति में फॉस्फोरस और पोटाश तत्व अच्छी प्रकार इस्तेमाल कर लिए जाते हैं और भूमि में इनकी उपलब्धता बनी रहती है. एजोटोबैक्टर सूक्ष्म जीव हवा की नाइट्रोजन को पौधे के लिए उपलब्ध करवाता है. अदरक को बुवाई के 40-90 दिनों के डयूरेशन पर पोषण कि खास जरुरत होती है क्योंकि यह समय बढ़वार का होता है. अदरक लगभग 200 दिन की फसल है.

सूक्ष्म पोषक तत्वों की बात करें तो जिंक, आयरन और मैग्नीशियम प्रमुख रूप से जरुरी हैं. ये सूक्ष्म पोषक पौधे द्वारा भोजन निर्माण  और रोग प्रतिरोधकता के लिए जरुरी होते हैं. अन्य पोषक तत्व जैसे बोरोन, सल्फर आदि भी अदरक के लिए जरुरी होते हैं. सल्फर की पर्याप्त मात्रा आयरन, जिंक, मैग्नीशियम के प्रयोग करने पर फसल को प्राप्त हो जाती है.

अदरक के खेत में व्हाइट फ्लाई और अन्य रस चूसक कीटों का नियंत्रण करने के लिए यलो ट्रैप का इस्तेमाल काफी कारगर रहता है. यह उपाय विष रहित कीट नियंत्रण की श्रेणी में आता है.

सारांश:

– बीज का सही चुनाव करें
– निमेटोड और फंगस को ध्यान में रखकर ही फसल का नियोजन करें
– खेत का नियमित भ्रमण करें
कंपोस्ट सहित समुचित पोषण प्रबंधन करें
– मित्र सूक्ष्म जीवों का इस्तेमाल करें
– अनावश्यक फफूंद नाशियों और कीट नाशियों  से बचें
– खरपतवार नष्ट करने वाले रसायनों कि जगह बैलों य छोटे ट्रैक्टर कि मदद से खरपतवार निकालें, इससे मिट्टी भुरभुरी और हवादार रहेगी और अधिक उत्पादन प्राप्त होगा

अधिक जानकारी के लिए whatsApp द्वारा 7987951207 पर संपर्क कर सकते हैं.

bacter की प्रकृति अनुकूल विधि से उगाया गया अदरक (ginger)

bacter विधि से लाभकारी सूक्ष्मजीवों और संतुलित पोषण के साथ बिना किसी रासायनिक फफूंद नाशी और बिना हानिकारक कीटनाशी के उगाई गई अदरक कि फसल के चित्र आप नीचे देख सकते हैं.

मित्र सूक्ष्म जीव शीघ्र अंकुरण को प्रोत्साहित करते हैं और जड़ों के विकास में सहायक हैं.
मित्र सूक्ष्म जीव शीघ्र अंकुरण को प्रोत्साहित करते हैं और जड़ों के विकास में सहायक हैं.
पोषण + मित्र सूक्ष्म जीव = मजबूत पौधे
पोषण + मित्र सूक्ष्म जीव = मजबूत पौधे
अदरक की 90 दिन की अवस्था, bacter विधि
देसी अदरक की 90 दिन की अवस्था, bacter विधि
बिना रासायनिक फफूंद नाशी, बिना रासायनिक कीट नाशी का अदरक : bacter विधि
बिना रासायनिक फफूंद नाशी, बिना रासायनिक कीट नाशी का देसी अदरक : bacter विधि
अगर पौधे मजबूत हों और मित्र सूक्ष्म जीवों का साथ हो तो जल भराव भी सहन कर सकते हैं.
अगर पौधे मजबूत हों और मित्र सूक्ष्म जीवों का साथ हो तो जल भराव भी सहन कर सकते हैं.

लेखक परिचय:

Pushpendra Awadhiya

डॉ. पुष्पेन्द्र अवधिया (Ph.D. लाइफ साइंस, M.Sc. इंडस्ट्रियल माइक्रोबायोलॉजी)

विषय रूचिसूक्ष्मजीव विज्ञान, कोशिका विज्ञान, जैव रसायन और प्रकृति अनुकूल टिकाऊ कृषि विधियां

कृषि में उन्नति के लिए सही विधियों की जानकारी उतनी ही जरुरी है जितना उन विधियों के पीछे के विज्ञान को समझने की है. ज्ञान-विज्ञान आधारित कृषि ही पर्यावरण में हो रहे बदलावों को सह पाने में सक्षम होती है और कम से कम खर्च में उच्च गुणवत्ता कि अधिकतम उत्पादकता दे सकती है. खेत का पर्यावरण सुधरेगा तो खेती लंबे समय तक चल पायेगी. आइये सब की भलाई के लिए विज्ञान और प्रकृति अनुकूलता की राह पर चलें.
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